Friday, June 29, 2012

विपक्ष या शासक

शहर से सड़क तक....
सफ़र से मंजिल तक ......
आसमान जैसा बड़ा.... 
या पैसे जैसा छोटा......

कौन हूं मैं.....??????
भीड़ में चलता एक आम आदमी.... या, बुलंदियों पर बैठा एक खाश आदमी....
माचिस की तीली जैसी कोशिश 
या फिर
हारा हुआ एक शख्श 

इस दौड़ती-भागती दुनिया में एक अपने हिस्से की ज़िन्दगी जीता एक रिश्ता  
या सिर्फ एक किस्मत ???
कौन हूं मैं.... ??

रेत से खेलता एक बच्चा 
या 
मकसद से लड़ता एक खिलाडी....

दिल के बहाने हँसता एक शायर 
या 
दुनिया के बहाने हँसने का नाटक करता एक कलाकार....

सच को समझता एक इंसान 
या 
मात्र, झूठ में जीता एक नागरिक
कौन हूं मैं?

दर्पण से कल्पना को समझता हुआ...
या 
किताबों से सफलता को नापता हुआ
कौन हूं मैं????

चाहरदीवारी में मजबूर
या
मोहल्ले का हीरो 

एक सवाल
या 
एक जज 

विपक्ष 
या 
शासक 
कौन हूं मैं....??????

Saturday, June 23, 2012

भविष्य हम जैसा चाहते हैं.... और उसे कैसे साकार करें.... इसी मकसद से ब्राज़ील के शहर "रियो डि जेनेरियो" में रियो+20 सम्मेलन का आयोजन किया गया.....  20 से 22 जून तक चले इस सम्मलेन के घोषणापत्र में भारत की चिंताएं साफ़ झलकती हैं.... जिसमें कहा गया है कि विकासशील देशों को सतत विकास के लिए और संसाधनों की जरूरत है... साथ ही, आधिकारिक विकास सहायता यानी ओडीए एवं वित्त व्यवस्था पर अवांछित शर्तों से बचना चाहिए.... भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिखरवार्ता के दौरान अपने संबोधन में कहा कि अगर अतिरिक्त धन और तकनीक उपलब्ध हुई तो विश्व के कई देश अधिक विकास  कर सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इन क्षेत्रों में औद्योगिक देशों से समर्थन कम होता है...... भारतीय प्रधानमंत्री ने विश्व समुदाय को ज़िम्मेदारी का अहसास कराते हुए कहा कि यह वैश्विक समुदाय की जिम्मेदारी है कि सम्मलेन को कैसे व्यावहारिक स्वरूप दिया जाय..... ताकि प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप विकास करे.......  
वर्ष 1992 में रिओ-डी-जेनेरियो में पर्यावरण की रक्षा के लिए  'पृथ्वी सम्मेलन' हुआ था...... इस सम्मेलन के बाद 1997 में क्योटो संधि की शर्तें सामने आईं..... अलबत्ता, क्योटो संधि की शर्तों पर सख्ती से अमल की उत्सुकता किसी देश ने नहीं दिखाई..... सबसे बड़ा ग्रीन-हाउस गैस उत्सर्जक देश अमेरिका ने इस संधि से खुद को बाहर ही रखा...... और क्योटो संधि एक मखौल बनकर रह गई....... क्योटो के बाद 2007 में बाली में संपन्न बैठक भी बेअसर रही...... उसके बाद, संयुक्त राष्ट्र के बुलावे पर कोपनहेगन सम्मलेन क्योटो शर्तों की नाकामी को खत्म करने की एक उम्मीद के रूप में देखी गई..... लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात.... वहीं, अपने स्वार्थों को पर्यावरण से ज्यादा अहमियत देने वाला अमेरिका एक बार फिर रियो प्लस ट्वेंटी से बाहर है...... अब देखना यह है कि अमेरिका की गैरमौजूदगी में भारत, ब्राज़ील, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे देश प्रकृति को बचाने के लिए रियो+20 सम्मेलन को कैसे साकार करते हैं..... 
पिछले दो दशक में पर्यावरण को बचाने के लिए विश्व के ज़्यादातर देश एक मंच पर ज़रूर आए..... लेकिन अमेरिका की हठधर्मी के कारण पर्यावरण और विकास के बीच का हल नहीं निकला..... पर्यावरण बचाने की ये मुहिम 20 वर्षों में रियो से चलकर क्योटो, बाली, कोपनहेगन और फिर वापस  रियो तक आ गई..... फिर भी भविष्य हम जैसा चाहते हैं... उसपर संशय बरकरार है....

Wednesday, February 15, 2012

इतिहास की उलझन में "गांधी" और इसमें हमारा भविष्य

60 साल के बजाय अगर पिछले 70 सालों को लें तो भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में "गांधी" शब्द से बड़ा कोई और शब्द नहीं दिखता. लेकिन ये दौर फेसबुक, गूगल का है. फिलहाल गांधी कागज और कम्पूटर की दिवार पर चिपके मिलते हैं, इसलिए ज़रूरी नहीं है कि "गांधी" जीतेगा. दलदल में फंसे वर्तमान को अगर बेहतर बनाना है तो फिर से "सम्पूर्ण क्रांति" लानी होगी. यह तय करना होगा कि अब क्या करना है? इसमे दिलचस्प होगा कि नव उदारवाद के दौर में "जेपी" कौन होगा?  
हर वो सख्श जो कहता था दरियादिली की बात आज कठघरे में खड़ा मुस्कुरा रहा है....
मैं कुछ दिनों से गांधी और गोडसे के बारे मैं पढ़ रहा हूं, इतिहास मैं उलझनें बहुत हैं शायद यही वह वजह है कि कभी गांधी हिरो दिखते हैं तो कभी पक्षपात से ग्रसित एक राजनेता जो जानता है कि इमानदारी और हिम्मत को कैसे मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है. गोडसे संघ की चारदीवारी से बाहर रावण की भूमिका में है. कुछ जगहों पर मिलता है कि भारत में उस वक़्त की राजनीति में ४ मुख्य चेहरे थे. पहला, जवाहरलाल नेहरु जिनकी विचारधारा क्या थी पता नहीं चल पाता. वो क्या चाहते थे, किसके थे, किसके लिए थे वगैरह - वगैरह..  दूसरा, बाबासाहेब जिन्हें उस वक़्त समाज में प्रेरणाश्रोत बनना था, वो दलित उत्थान की बात कर हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ा बैठे. उसी वक़्त गोडसे कुछ उन चन्द लोगों में से थे जो हिन्दुओं को जोड़ने और बचाने में परेशान थे. और चौथे थे गांधी (मोहनदास करम चन्द गांधी). वैसे तो देश गाँधी का था लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि उस वक़्त की राजनीति ये चाहती थी कि गांधी ना रहें. गांधी पर एक सप्ताह पहले भी हमला हो चुका था फिर भी उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त क्यूँ नहीं हुआ इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता. गांधी हत्या की नैतिक ज़िम्मेदारी जवाहरलाल नहीं लेते हैं. मैं ये बिलकुल नहीं मानता कि गोडसे ने सही किया. लेकिन गलती गोडसे कि थी मैं ये भी नहीं मानता. मुझे लगता है गांधी खुद अपनी हत्या के ज़िम्मेदार थे, और दूसरी गलती नेहरु की थी. गांधी की हत्या के पीछे उनका मुस्लिम प्रेम था जिसका जिक्र कई जगह पर मिलता है. भाईचारा और इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले गांधी खुद इन्हीं वजहों से कठघरे में दिखते हैं. लोकतंत्र में हिंसक रवैया अपनाने वाले गोडसे भी कठघरे में दिखते हैं. नेहरु, बाबासाहेब, बल्लभ भाई पटेल सभी कंही न कंही वर्तमान भारत की दशा के लिए कठघरे में दिखते हैं. और सबसे बड़ा गुनहगार वो शब्द "गांधी" दिखता है जो कईयों को तोहफ़े में आजीवन मिला है. 
इतिहास में कई और उलझनें भी हैं, कहीं कहीं ये उल्लेख भी मिलता है कि नेहरु परिवार मुस्लिम से हिन्दू परिवर्तित है. जो मूलतः कश्मीर के थे और आगरा में बस चुके थे. इसे पिछले ६ दशकों में दबी कुचली ज़बान से बोला गया है. गोडसे में हैदराबाद के निजाम की वजह से मुस्लिम विरोध दिखता है जिससे आहत वो गांधी की हत्या कर बैठते हैं. बाबासाहेब  आज भी जिंदा दिखते हैं जब मायावती, मंडल और वामपंथी धडा अपनी राग अलापता है. और गांधी इस देश में सदैव ज़िंदा रहेंगे जिसका अनुमान भी इतिहास के इन्हीं पन्नों में मिलता है. नेहरु और गांधी की उपज इंदिरा थोड़ी सशक्त और जिंदादिल ज़रूर दिखती हैं लेकिन ये देश उनकी जागीर थी यह समझने की भूल वह भी कर बैठती हैं. राजीव, राहुल फ़िरोज़ गांधी के वंशज हैं लेकिन इतिहास उन्हें नेहरु के साथ देखता है. सोनिया भारत की हैं इसे लोकतंत्र तो मानता है लेकिन जनमानस नहीं. इतिहासकार और उस वक़्त के कई लेखक जिनके शब्द हमतक पहुँचते हैं उनकी बातें कुछ और होती हैं.  उनकी जीवनशैली, प्रतिष्ठा और नज़रंदाज़ी इतिहास के पन्नों में उलझन डालती है लेकिन जिन लेखकों की आवाज़ हम तक नहीं पहुच पायी इतिहास में वो आज भी नगण्य हैं. 
 ये उलझन आज़ादी की नीवं को कमज़ोर बनाती है इसलिए ज़रूरी नहीं है कि "गांधी" जीतेगा. दलदल में फंसे वर्तमान को अगर बेहतर बनाना है तो फिर से "सम्पूर्ण क्रांति" लानी होगी. सब कुछ फिर से बदलना होगा. यह तय करना होगा कि अब क्या करना है? इसमे दिलचस्प होगा कि नव उदारवाद के दौर में "जेपी" कौन होगा? 

Tuesday, February 14, 2012

Journey of My Love till the first Valentine


 "It is wrong to think that love comes from long companionship and persevering courtship. Love is the offspring of spiritual affinity and unless that affinity is created in a moment, it will not be created for years or even generations." Kahlil Gibran 
I am Confused, but its not the right time. Its a season of LOVE, so this time Me n My Journey towards Love.It started with my father, because he is the proof of my presence and then He gave me a name unfortunately it was "Prem". it wasn't the end. He putted one another word "Sagar" with this. Anyway it wasn't the certified till i was in the home, because i was a brilliant student and an angry child man. After 5th I went to hostel, and i think that was the time supported me what i am today & it leads to my name (Prem Sagar).
Patna, My first love. It wasn't from my side. It was a mistake of Saket, Sudhir & Ajay. But i apologize the mistake. Sorry. I never wanted anything. Actually till 2002 i wasn't able to know this word called Love. Neither with family nor with friends. I was selfish. still i am but that time i was child by brain at the age of 20. Now I am proud on myself and all the credit goes to few prettiest women, who came to my life and made me perfectly.
 As my Name goes to the "ocean of love" which first ever come to me at the age of 18th. I was failed in my Board exam and had been shifted to an another hostel where i met my first girl friend Anju 0r Deepmaala Singh Sengar, My first friend Ever and unfortunately She was a Girl. But she was in love with 4 guys at the same time. I counted her badly. But She was so nice to Me and that's what i wanted too. During these days I met a guy who was a Homo :) i wasnt involved obviously but that was the time i came to know a word called "Sex". Actually that was the first time i was changing. I was failed again in my board's exam and suffering from a big social problem. Anju is good, I hope. She is married and I Think!  She lives in Jamshedpur, anyway I came to patna in 2002 and falls in a misunderstanding because of few friends and it it was a physical attraction too.
Raipur wasn't an incident it was an accident. Which came it to me from other side and made me guilty. anyway this chapter i dnt want to discuss because i ended it few years back.
But after that two beautiful and most amazing people came to my life. One was a women who came to me just like a mother, a sister, a friend, a mentor, a companion. Initially i wasn't loved her She was my best friend and I am her too. She done mistake and braked the rule. We aren't together but we will be together always . Actually it wasn't just a love. She was my "Mum". My love was just a reflection of my regards. That was my first and last college days which was the revolution era of telecommunication. being a student, Being a friend, being a human it was an awesome period in my life. Thank You.  I am, What I am & its all because of u :)
By the way i haven't told you about my last lady. Actually she wasn't a lady. She was my kid. A girl, Who wasn't innocent, but a typical suburbs girl who knew everything. you cant make her fool. we never loved each other but it wasn't less then love & She wasn't like other girl I met ever. And She was, She is & She will be my best girl Friend.  Her Self respect, Her Soul, her Purity, her Brain everything which connects to her is checked and defined. Now She is vary mature but still so unpredictable. Thank You Phillips I dnt have words for you but you are the one who taught me perfection and how to proud. My Love, my availability will always guide you till my end. take care.
I am Married now and this is my first season of Love. Consider "Prem's Love" and you people will be Shocked and happy too. My philosophy leads to me a proud husband and on this valentine We will celebrate it Proudly. Initially i hated it because it came to me easily but Marriage is the best tutorial where any one can learn Love as a part of life. No attraction no fear. Happy Valentines Ladies. and Specially My Wife. Love You always :)))))
 Forget to mention my last valentine... Sorry Miss Jaipur :)  I'll remember CP n U always. take care

Sunday, November 27, 2011

If you do it right, once is enough


“You only live once, but if you do it right, once is enough.”  ― Mae West

Isn't it ? thoughts, words, feelings, decision & people the all surrounds us in a time period & we always in search of happiness lost to understand it.
Once i did Bio and wanna be a doctor. i wasn't. Then somebody met me in a train and had a bomb Idea, which changed my life. till that time I was no one. but after that i was someone. But now again I am No One.
Just like Chetan Bhagat's Five point someone, I was on the way of Delhi for a medical entrance exam. In passenger's list i was searching the name of people around me during the journey. for last seven years it was my good luck but for now it was my bad luck. I met a journo in front of my Berth. he was the first one who successfully scanned me and suggested me to become a journalist. when it comes to me i found myself very worth full, and so, i started dreaming my old BBC days.
Journey Begins
but my family wasn't sure that i should opt this. my father had few journo friends and they were (and still they are ) writing the truth for few bucks. I told him i m not that kind of person. I have my social values and respect so i'll never do this. but he wanted me to opt any government job and so, he suggested me to be a part of Banaras Hindu University ( where i was selected ) for my graduation course. i struggled too much for a world of fame, for taking a responsibility to change the look of nation and i decided to quit home.
I did this, and came back to Patna. and filled the form of Amity University, Raipur Campus. i was single son of my parents. so, I knew at some point they had to loose. and finally amity called me for an interview.
Raipur Days
I was n still I am poor in English, and first time i knew the power of it. but i won and interviewed in Hindi and enrolled for Mass Communication Course. i did it with lots of struggle. in terms of language, personality, money, government and relations. But for certain government policy i had to switch myself lucknow with bunch of my friends.
Lucknow Days
Lucknow changed my life. Madiha Hasan, Shinjini Singh, Harshita Talwar, Harsh Singh, Ashish Dixit and the most talented buddy Hem taught me at every point of mistake. they care me, they loved me and they made me, what I am today. Ashish tiwari, Stuti Bagrecha, Namrata srivastva, Monalika Ray, Nupur Gupta & Shriya sengupta few were more who loved me as i am. and support me all the time. But few people like Anita Gautam, Ashish Khare, Ritu Sen & Minisha Singh was the mentor who developed me as i was. in true meanings lko days made me Mad and still it continued.
Post Journalism and pre-communication Days
Mumbai to pune, pune to mumbai, mumbai to delhi, delhi to mumbai and finally mumbai to delhi.... Cinema my new buddy was at my head. I forget my past and started dreaming a prem called Director Prem. during these day i met with real world. pain, hunger, defeat, silence, loneliness and list goes on n on.......
Delhi could be a better start but unfortunately it couldn't. anyway I got Chhoti back in my life and Phillips and Hathi were in the package. thank God they still are with me.
But it wasn't beautiful. Optimism is good all the time but at the end result matters.
Signing out
Take care.

Saturday, September 3, 2011

राजनेताओं के खेल में फंसा विधेयक


कहा और माना जा रहा है कि युवा इस देश की किस्मत लिखंगे . कई हैं जो इस रास्ते पर चल भी रहे हैं. ताजा उदाहरण युवा एवं खेल मंत्रालय संभाल रहे दिल्ली के युवा नेता अजय माकन की करते हैं.  दिल्ली के निवासी और राष्ट्रमंडल खेलों को नजदीक से देखने वाले माकन ने भारतीय खेलों की नसीब लिखने का बीड़ा उठाया और खेल विधेयक को संसद में लेकर आए. पर उन्हें वापस उसी रास्ते पर भेज दिया गया जिस रास्ते से चलकर कभी 8 ओलंपक स्वर्ण जीत चुकी भारतीय हॉकी चलती आ रही है. ये क्यों और कैसे हुआ ये समझना ज़रूरी है. सिक्के के तीन पहलू हैं. पहला अजय माकन जो युवा राजनेता हैं और कांग्रेस पार्टी के दिल्ली से संसद हैं. माकन पहली बार चर्चा में तब आए थे जब शिला दीक्षित  ने अपने मंत्रिमंडल में माकन को ट्रांसपोर्ट, पॉवर, और टूरिज्म मंत्रालय का कार्यभार दिया था. 2001 में मंत्रालय मिलते ही माकन ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाली गाड़ियों के लिए सीएनजी के प्रयोग से दिल्ली के वायुमंडल को ज्यादा प्रदुषण से बचाने तथा पेट्रोल और डीजल पर बढ़ रहे बोझ से मुक्ति दिलाई.  इस बार माकन ने खेलों के वायुमंडल में फैले प्रदुषण को हटाने की कोशिश की थी. पर यंहा सिक्के के दुसरे पहलू में बैठे लोग थे. खेल संघों के कार्यकारणी में बैठे लोग. अगर आज़ाद भारत का इतिहास उठा कर देखा जाए तो इन्ही लोगों के कारण भारतीय खेलों का पतन दिखता है. केन्द्रीय या राज्य स्तरीय खेल संघो में राजनेताओं और उद्योगपतियों की जमात है जो कई सालों से कब्ज़ा जमाये बैठे हैं, और इन्हीं संघों में पूर्व खिलाड़ियों की उपस्थिति अंगुलियों पर गिनी जा सकती है. यही वजह बनती है खेलों में भ्रस्टाचार पनपने की. खेलों पर राजनीतिक ज़मावड़े के कारण माकन की कोशिश थी कि खेल संघों को सुचना के अधिकार कानून के तहत लाया जाए जिससे इसमें पारदर्शिता लाई जा सकती है. साथ ही कार्यकारणी में 25 प्रतिशत से ज्यादा वो लोग हों जो कभी संबंधित खेल से खिलाड़ी के तौर पर जुड़े रहे हों. पर ऐसे कदम से उन राजनेताओं की रोजी रोटी बंद हो जाएगी जो खेल संघ के पद पर रहते हुए मोटी कमाई करते हैं  और प्रोफाइल को समाज में कैश कराते हैं. 
ज़रा ध्यान दीजिये शरद पवार (क्रिकेट, महाराष्ट्र ओलंपिक संघ ), सुरेश कलमाड़ी (ओलंपिक), विजय मल्होत्रा (तीरंदाजी), अभय सिंह चौटाला (बॉक्सिंग), जगदीश टायटलर (जुडो), अखिलेश दास (बैडमिन्टन, उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ), प्रफुल पटेल (फ़ुटबाल), यशवंत सिन्हा (टेनिस), बिरेन्द्र प्रताप वैश्य (वेटलिफ्टिंग), तरुण गोगोई, रोक्य्बुल हुसैन ( असम ओलंपिक संघ ), रमण सिंह ( छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ ), जे पी नद्दा, ( हिमाचल ओलंपिक संघ), रमेश मेंडोला ( मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ ), बिजोय कोइजम (मणिपुर ओलंपिक संघ), लाल थान्ह्वाला (मिजोरम ओलंपिक संघ), नेइफिउ रिओ (नागालैंड ओलंपिक संघ), समीर डे (उड़ीसा ओलंपिक संघ), सुखदेव सिंह धीधंसा (पंजाब ओलंपिक संघ), फारूख अब्दुल्ला (जम्मू एवं कश्मीर क्रिकेट संघ ), सी पी जोशी ( राजस्थान क्रिकेट संघ ), विलासराव देशमुख (मुंबई क्रिकेट संघ ), ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ ), राजीव शुक्ला (उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ ), अरुण जेटली (दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ), नरेंद्र मोदी (गुजरात क्रिकेट संघ), दयानंद नार्वेकर (गोवा क्रिकेट संघ) और अनुराग ठाकुर ( हिमाचल क्रिकेट, ओलंपिक संघ ) जैसे व्यक्ति राजनेता हैं. इनके अलावा पंजाब के आई एस बिंद्रा, विदर्भ के प्रकाश दीक्षित, सौराष्ट्र के भारत शाह, बंगाल के जगमोहन डालमिया, केरल के टी आर बालाकृष्णन, झारखण्ड के अमिताभ चौधरी, आंध्र प्रदेश के डी वी सुब्बाराव समेत सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी किसी राज्य या राष्ट्रिय स्तर का कोई भी खेल नहीं खेला है सिवाय खेल संघों में बैठ कर खिलाड़ियों के भविष्य के साथ खेलने के. 
खेल विधेयक को लाने में जिस तीसरे पहलु से माकन को सबसे ज्यादा मुंह की खानी पड़ी वो बीसीसीआई है. राजनेताओं और उद्योगपतियों के भरमार होने के बावजूद  बीसीसीआई एक सफल संस्था है जिसने भारतीय क्रिकेट को वाकई नया आयाम दिया है. फिर भी सच्चाई यह है कि क्रिकेट का भी जीवनपर्यंत भला तभी संभव है जब इसे रेगुलेट करने वाले लोग क्रिकेटर हों. बीसीसीआई में काबिज एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला, अरुण जेटली जैसे लोगों के पास और भी कई काम है मसलन वकालत, उद्योग, देशवासियों का विकास वगैरह, वगैरह. पूर्व क्रिकेटर जो सन्यास के बाद खाली बैठे हैं वो भारतीय क्रिकेट को ज्यादा समय दे सकते हैं. खेल विधेक में  माकन का नज़रिया एक हद तक जायज है. कार्यकारणी में 25 प्रतिशत से ज्यादा खिलाड़ियों के होने से खिलाड़ियों के नज़रिए को मजबूती मिलेगी एवं उनकी खेलों को लेकर समझ क्रिकेट के भविष्य को और भी बेहतर बनाएगी. और जंहा तक सवाल है सुचना के अधिकार की तो बीसीसीआई से जुड़े और खेल विधेयक का विरोध कर रहे लोगों को ये मालूम होना चाहिए कि फिलहाल धोनी बीसीसीआई के कप्तान नहीं हैं बल्कि भारतीय टीम के कप्तान हैं. सचिन बीसीसीआई के लिए नहीं खेलते वो प्रभाष जोशी जैसे उन दर्शकों के लिए खेलते हैं जिन्हें सचिन के आउट होने पर हार्ट अटैक आ जाता है. भारतीय टीम में खेलने वाले और इन्हें रेगुलेट करने वालों पर सूचना लेने का अधिकार है देशवासियों को. ये राजीव शुक्ला तय नहीं कर सकते यह दर्शक तय करेंगे.  अजय माकन के प्रयास को सबसे ज्यादा विरोध का सामना बीसीसीआई और ओलंपिक संघ का करना पड़ा. लेकिन ओलंपिक संघ के कार्यकारणी के इतिहास पर  ज़रा नज़र डालिए. दोराबजी टाटा 10 साल, महराजा भूपिंदर सिंह 10 साल, महराज भूपिंदर सिंह के बड़े बेटे महराजा यादविंद्र सिंह 22 साल एवं छोटे बेटे भालिन्द्र सिंह 19 साल, ऑम प्रकाश मेहरा 4 साल, विद्या चरण शुक्ला 3 साल, सिवंती अदिथन 9 साल, सुरेश कलमाड़ी 15 साल.  और इतिहास के पन्ने को एक बार फिर पलटिये ये जानने के लिए कि क्रिकेट और हॉकी को छोड़कर खेलों में हमने किया क्या? 
लेखक वॉयस ऑफ मूवमेंट दैनिक अखबार के समाचार सम्पादक हैं. 

Sunday, August 14, 2011

किस्मत और उम्मीद


आज़ादी तय थी इसलिए हमें मिली. ये शब्द मेरे नहीं बल्कि आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के थे. पर प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने अपने पहले भाषण में "किस्मत" के अलावा एक और महत्वपूर्ण शब्द का प्रयोग किया था, "उम्मीद". उम्मीद एक बेहतर राष्ट्र निर्माण की. कंहा हैं बेहतर राष्ट्र ? और ये सवाल अब किससे किया जाय ? पंडित नेहरु की आत्मा से या उनके वंशजों से, जो आज भी उम्मीद की बात करते हैं. भविष्य की किस्मत को अगर वर्तमान की उम्मीद के तौर पर देखें तो पंडित नेहरु समेत तमाम लोग जिन्होंने देश की बेहतरी की बात की, बेईमान लगते हैं. 
मैं सुबह घर से निकलता हूं और दिनभर हिन्दुस्तान की गलियों में, घरों में घूमता रहता हूं. दुकानदार को जब बेचता देखता हूं तो वो कोई और दिखता है जब उसे खरीददार बना देखता हूं तो वो कोई और दिखता है. नेताओं को जब बोलता हुआ देखता हूं वो कोई और होता है जब उसे किसी राजनितिक समीकरण बनाता देखता हूं वो कोई और होता है. मैं दुखी ज़रूर हूं पर भ्रस्टाचार से नहीं और ना ही  भ्रस्टाचारियों से. यहां तो हर कोई भ्रस्ट है. दुखी इस बात से हूं कि मैं यंहा हर रोज़ अपने उम्मीद को हारते देखता हूं.  पुलिस की मजबूरी  से दुखी होता हूं. वकीलों के तर्क से दुखी होता हूं. मीडिया के नज़रिए से दुखी होता हूं. हमारे ऑफिस में 4000 की पगार पर दिन भर मेहनत करने वाले एक सहयोगी को अपनी बहन की शादी के दहेज़ के लिए ज़मा करते पैसे से हतप्रभ होता हूं. 
हां, जंग में कुर्बानियां होती हैं और इस बात का अफ़सोस उन्हें भी नहीं था जो शहीद हो गए. पर इस बात की ख़ुशी उन्हें मिल गई जो जिन्दा बच गए थे. आज़ादी की लड़ाई को उन लोगों ने हर गली, हर मोहल्ले में कैश किया. पंडित नेहरु की उम्मीद कंहा चली गई जब उनके वंशजों के शासन काल में पुणे में एक और जालियांवाला नरसंहार हुआ. क्या नेहरु को नहीं मालूम था कि ६ दशक बाद उनकी उम्मीद क्या रूप अख्तियार करेगी. खूलेआम डकैती हो रही है, लूट हो रही है, बलात्कार हो रहे हैं. शासन भ्रस्ट है. प्रशासन मजबूर है. क्रिमिनल आज़ाद हैं. आम नागरिक परेशान हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं. राजनेता एक दुसरे पर सिर्फ आरोप प्रत्यरोप कर रहे हैं. क्या नेहरु की उम्मीद यही थी. अगर यही थी तो राहुल गांधी की उम्मीद का क्या रूप होगा उसका अनुमान किसी भी  देशभक्त के रोंगटे खड़ा कर सकता है. कंहा होंगे हम अगले ६ दशक में. अरबों की आबादी, अशिक्षा, बेरोजगारी कुछ भी नियंत्रण में नहीं है. और अब ना तो समाज रहा ना ही अनुशासन. गांव अब शहर आ चुका है, शहर में पैर रखने की जगह नहीं है. शहरों में संसाधन नहीं हैं. गांव में जंहा मौजूद संसाधनों को विकसित किया जा सकता है वंहा वितरण की कोई नीति नहीं है. 
ज़रा फ़र्क देखिये गुलाम और आज़ाद भारत में, कल जब मराठावाद की गूंज उठी थी तब मकसद अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना था, आज़ाद भारत का मराठावाद अब अपने ही देश में अलगाव पैदा कर रहा है. कल तक जिनके चेहरे से नफरत थी हमारे पूर्वजों को आज उनके बनाये फास्ट फ़ूड हमें रोटी दाल से अच्छे लगते हैं. कल विरोध का मतलब था सुख, शांति, चैन आज विरोध का मतलब है स्वार्थ, अपनी ख़ुशी. एक हद तक ये गलत भी नहीं है पर फिर देश, समाज, विकास के ये खाखोसले ढोंग क्यों ? भारतीयों से बेहतर भारत को मैकाले ने समझा था जिसका परिणाम हमारे सामने है. ना हमारी भाषा, ना हमारी संस्कृति हमारी संपत्ति है. सब खत्म हो गया, अंग्रेज गए अपनी अंग्रेजी छोड़ गए. 
जात पात, उंच नीच, छोटा बड़ा, गाँव, शहर, मोहल्ला, मर्द, औरत, मालिक, नौकर, सीनियर, जूनियर और ना जाने कितने उपनामों से हमने खुद को एक दुसरे से अलग कर रखा है. और अनेकता में एकता का पाठ पढ़ाकर बौद्धिक जुगाली में खुश होते हैं हम. कोई जन लोकपाल बिल इस देश को नहीं बदल सकता. और न ही कोई अन्ना हमारा नसीब लिख सकता है. इस देश को हम खुद बदल सकते हैं. पर इसके लिए हमें बदलना होगा. औरों को परखना बंद करना होगा. खुद को शीशे के सामने रख खुद के अन्दर के कलमाड़ी और ए राजा की पहचान करनी होगी .