Sunday, August 4, 2013

रिश्तों की ये डोर बस चलती रहे, ताउम्र


मेरे लिए दोस्ती थोड़ी अलग थी. शायद, यही वजह है कि मैं कभी डरा नहीं। लेकिन आज जब सारे दोस्तों से दूर अपने घर पर हूँ तो उनकी बहुत याद आती है. ऐसा नहीं है कि आज दोस्ती दिवस है इसलिए, बल्कि इसलिए कि अब आज़ाद नहीं हूँ . कुछ रिश्तों की मजबूरियाँ होती है. मसलन माता-पिता, पत्नी, बच्चे, भाई-बहन व् अन्य रिश्तेदार। ये वो रिश्ते हैं जिन्हें हम चाह कर भी खुद से दूर नहीं कर सकते. वहीं दोस्त हम खुद बनाते है, खुद निभाते हैं. यही कारण है कि दोस्ती हर रिश्ते से खाश हो जाता है. 
मेरा बचपन, युवावस्था घर से दूर दोस्तों के साथ बीता { मैं अनुशाषित नहीं हूँ इसका एक कारण ये भी है }. और मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों ऐसे दोस्त मिले जिन्होंने मुझे अपने दिल के सबसे करीब रखा, मेरे आत्म-सम्मान को कभी चोट नहीं पहुँचाया और सबसे बड़ी बात उन्होंने कई बार  गैर-वक़्त में मुझे कभी घर की कमी मह्शूश नहीं होने दिया. ऐसे ही कुछ संस्मरण के साथ मेरे प्यारे दोस्तों को मेरा ढेर सारा प्यार और शुभ कामनाएँ . 

अंजू सिंह सेंगर : मेरी पहली दोस्त जिसने मुझे समझाया एक लड़का और एक लड़की भी दोस्त हो सकते हैं. बगोदर में हमारे वो दो साल रिश्तों के रोमांच की वो पहली बारिश थी. 

साकेत सिंह : शुक्रिया मेरे भाई तुमने मुझे जिंदादिल, निडर और चालाक बनाया। पटना में तुम्हारे साथ ( सुधीर, अजय और अन्य ) बिताए वो दो साल काफी रोमांचक रहे. और वो बुनियाद आज तक जारी है. 

प्रकाश : हमारे रिश्ते को क्या नाम दूं मुझे नहीं मालूम, लेकिन तब यह दोस्ती से भी ऊपर था. 1998 से लेकर 2013 तक भी यह वैसा ही है. इसलिए शुक्रिया क्यूंकि ये आपकी वजह से है. 

आशीष तिवारी : मेरा पहला दोस्त जो मुझे बिहार से बाहर मिला. रायपुर में तुम्हारे साथ बिताये उन पलों को याद कर मैं शिहर उठता हूँ . इतने कम समय में हमने कितनी ज़िन्दगी वहां जी है वो सिर्फ मैं और तुम समझ सकते हैं . तुम्हारी ऊर्जा असीमित है, इसे बरकरार रखना और लड़ाई जारी रखना। 

मिसेज बोथरा : मैं तुम्हे भले ही छोटी कहकर बुलाता हूँ लेकिन तुम घर से दूर मेरी मां की तरह थी . तुम करोड़ों में एक हो, न सिर्फ मेरे लिए बल्कि अपने हर दोस्तों के लिए. मुझे बहुत खुशी मिलती है जब हर कोई तुम्हारी तारीफ़ करता है. 

मदीहा हसन : क्या कहूँ ? मेरी खुश नसीबी थी कि हमलोग रायपुर से लखनऊ शिफ्ट हुए. वंहा मुझे तुम मिलीं। तुमने मुझे जीना सिखाया, बोलना सिखाया। आज भी मैं जब मुसीबत में होता हूँ तो तुम याद आती हो. मैं तुम्हारी दोस्ती के लायक नहीं था फिर भी मेरे कुछ अच्छे करम होंगे कि तुमने मुझपर यकीन किया। मुझे आज भी इस बात पर गर्व होता है कि मैंने तुम्हारे नज़रिए को एक हद तक गलत साबित किया ( बिहारियों को लेकर ).  अपना ख़्याल रखना और अपने मियाँ का भी :) 

शिंजिनी  सिंह : वो लगभग तीन साल. मैं, तुम और हमारा नज़रिया . अगर तुम न मिलती तो शायद मैं सामाजिक न्याय को लेकर आज भी लड़ नहीं रहा होता। मैं भी किसी कंपनी का पट्टा अपने गले में टांगकर शहर की अंधी - बेमंजिल दौड़ में शामिल होता। तुम्हारे कारण मैं थोड़ी बहुत अंग्रेजी समझ पाया और शायद मेरी वजह से तुम हिंदी। ज़िन्दगी में ज़्यादातर लोगों को ऐसा मौका कम ही मिलता है कि उनके पास तुम्हारे जैसा दोस्त हो . मुझे गर्व है कि मुझे ये मौक़ा मिला। और खुश हूँ कि इस साल मुझे तुम्हारे साथ रहने का एक और मौका मिलने जा रहा है.  

हर्षिता तलवार (मिसेज उप्पल) : थोड़ी सी हंसी, थोडा सा गुस्सा और ढेर सारी शरारतें। यक़ीनन तुम त्रिमूर्ति का साथ वो भी एक साथ और मुझ जैसे जाहिल गंवार को. ख़ुशी होती है यह जानकार कि तुम आज भी वैसी ही हो. बस ऐसी ही रहना। 

आशीष दीक्षित : मेरा भाई, मेरी माशूका, मेरी जान तुम बहुत याद आते हो. मैं जब जब रोता हूँ तो तेरी बहुत याद आती है, लगता है काश तुम साथ होते, मुझे समझाते, डाँटते। तुम साथ नहीं हो तो लगता है कि अकेलापन क्या होता है. तुमने मुझपर जो यकीन इतने वर्षों से दिखाया है मैं उसे जाया नहीं होने दूंगा मेरे भाई. बस किसी तरह मेरी ज़िन्दगी में लौट आओ. 

विष्णु कटारा : दोस्त तुम अलग हो. और सबसे खाश बात यह है कि तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है जिसमे मुझ जैसे कई दोस्तों के लिए अथाह जगह है. तुम प्राईसलेस हो. तुम्हारे दिल के करीब रहना बहुद ही सुखद अनुभव रहा है और उम्मीद करते हैं आगे भी रहेगा। तुम्हारा असाधारण व्यक्तित्व और साधारण व्यवहार आज के दौर में प्रासंगिक नहीं है लेकिन यह बेहतरीन है और इसे जाने मत देना।  
फीलिप्स : अगर तुम न होती तो शायद मैं ये लड़ाई हार चुका होता। नोयडा में तम्हारा साथ वो भी मेरे सबसे मुश्किल वक़्त में वाकई सिर्फ तुम दे सकती थी. ज़िन्दगी में तुमने मुझसे ज्यादा उतार चढ़ाव देखे हैं, तुम आज भी किस्मत से लड़ रही हो और यकीन रखना मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ. 

शशिकान्त : ज़िन्दगी के मध्य में तुम्हारा लम्बा साथ मुझे आज भी अपने सपनों के लिए प्रेरित करता है . जाने अनजाने तुम कई भूल करते रहे फिर भी हम साथ हैं, ये सब कुछ तुम्हारे प्रयासों का नतीजा है. मोड़ पर रोशनी है, ज़रुरत बस चलते रहने की है. यूँ ही चलते रहो. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ. 

प्रखर सिंह : कॉलेज दिनों में हम दोस्त रहे न रहे, लेकिन वक़्त ने हमें दोस्त बना ही दिया। तुम्हारा घर के प्रति प्यार, अपनो के साथ हमेशा खड़े रहने की सोच और नशे से दूरी तुम्हे एक अलग लीग में खड़ा करता है. अखबार के दौरान तुम्हारा साथ (व्यक्तिगत) मिला इसके लिए शुक्रिया। हम हमेशा साथ रहेंगे तबतक, जबतक हमारी मंजिल न मिल जाए. तुम इकलौते  दोस्त हो जो मेरी सोच के समकक्ष मेरा साथ निभाते हो और यही हमारी नजदीकियों का सबसे अहम् कारण  है. मैंने तुमसे बहुत कुछ सिखा है, उम्मीद करता हूँ ये सिलसिला जारी रहेगा। 

अतुल शंकर राय : अतुल भैया आप करोड़ों में एक हैं. हम सब की खुशनसीबी है कि  हम आपके दोस्तों की लिस्ट में हैं. आप एक बेहतरीन और नेकदिल इंसान हैं इसलिए सिर्फ आपसे उम्मीद करता हूँ कि  बस ऐसे ही रहिए। समाज और देश को आपकी ज़रुरत है. आपकी निडर सोच हम सबको हौंसला देती है. हमारा हर सपना पूरा होगा जो हमने बम्बई से लेकर दिल्ली और लखनऊ की गलियों में देखा था बस यूँ ही स्पोर्टी बने रहिये। आपका असाधारण व्यक्तित्व और साधारण व्यवहार आज के दौर में प्रासंगिक नहीं है फिर भी आपकी जवाबदेही आपको ऐसे ही बने रहने को मजबूर कराती है जो इंसानियत के लिए एक बेहतरीन तोहफा है. आपके होने का एक खाश मकसद है इसे ताउम्र म्हणत कर साबित करते रहना होगा। 

कारू सक्सेना : हम यूँ मिले तो पहले ही थे लेकिन अब जाना हममे कॉमन क्या था. हम दोस्त अब बने हैं लेकिन शायद हमें पहले होना था. उम्मीद करते हैं ज़िन्दगी में कई बेहतरीन मौके आयेंगे। 

आप सबों के अलावा कई और भी हैं जिनके साथ बेहतरीन वक़्त गुजरा। हमेशा साथ मिला। प्यार मिला। और आज भी सबकुछ वैसा ही है जैसा था. सोभित निगम भाई, हेमेन्द्र धर, अमित शर्मा, संदीप पाण्डेय, प्रितपाल, कृति गुप्ता, निधी, नम्रता, ईशा, अखिलेश भाई, राहुल पाण्डेय, नितेश सिंह, निशांत, के पी मौर्य और कई अन्य आप सबों को ढेर सारा प्यार और दोस्ती दिवस की सुभ कामनाएं .… 
आपका 
प्रेम सागर 

Friday, June 28, 2013

Solar means Energy Democracy

Climate change, resource depletion and energy security
Energy and climate change are two of the issues that will dominate the next century. Right now we need solutions that can help us address both issues at once, whilst allowing our communities to thrive. There are not many places to turn for answers to these challenges and in the India we are currently being Victimized for our energy need by Systems and Governments. When many other industrialized nations like Germany are abandoning this technology to focus on a 100% renewable future.
We need solar not just because we don’t have many options left – but because there are so many positives.
Solar means an infinite clean, green energy resource
  • Every hour enough solar energy lands on the earth to power the whole of mankind’s energy needs for a year.
  • Solar photovoltaic (PV) is a reliable technology that produces zero carbon electricity for up to 50 years.
  • Solar energy provides protection against rapidly rising oil and gas prices.
  • The costs of solar PV is falling rapidly.
  • Solar PV is completely safe – it does not even have moving parts.
  • Nuclear power is expensive and there is currently no solution to disposal of highly toxic nuclear waste.
  • Solar PV is a socially acceptable technology with widespread application
  • It is modular and equally effective whether deployed on a small or large scale.
  • Solar PV is easily deploy-able NOW in large volumes.
  • Solar PV provides benefits for businesses, individuals and communities.
  • People actually like solar PV – and want to use it.
  • We can provide clean green solar energy for years to come.
Solar means Energy Democracy
PV allows us to democratise energy and distribute access to energy more fairly. You and your roof become a power station, and you are less reliant on highly inefficient and polluting central power stations.
Solar PV technology will help us to break away from dependence on a finite and increasingly dangerous fuel resource – and fast!

Friday, July 27, 2012

ख़त्म होने लगी हाथियों के 'कॉरिडोर'

जैसे जैसे समाज का विकास होता गया.... मनुष्यों ने खुद को जीवित रखने के लिए प्रकृति और जानवरों का खूब दोहन किया..... अपने स्वार्थ के लिए इंसानों की यही भूल..... आज उन्हीं के सामने मौत बनकर खड़ी है..... लेकिन अफ़सोस यह है कि इनसे बचने के लिए इंसान फिर से वही भूल कर रहे हैं.... जो वो सदियों से करते आए हैं..... वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों पर इंसान का कब्ज़ा हाथियों के लिए मुसीबत बन गई..... हाथियों के 'कॉरिडोर' में खेती होने लगी...... और वक़्त के साथ हाथियों को हत्यारा कहा जाने लगा.... लेकिन ज़रा सोचिये पहली गलती किसकी है..... इंसानों की या हाथियों की ? एक वक़्त था जब एशियाई हाथी भारत के विशाल जंगलों में बेरोक-टोक घूमा करते थे...... लेकिन वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में इंसानों की घुसपैठ ने हाथियों के निवास को लगातार संकुचित कर दिया..... पिछले साल, देश भर में करीब 5,872.18 हेक्टेयर जंगल खत्म कर दिए गए और इस साल भी जंगल पर हमला जारी है........ जिससे हाथी उत्तराखंड, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, झारखण्ड और ओडिशा के जंगलों में बेबस हो गए हैं...... दरअसल, 1999 तक हाथियों के विचरण करने का इलाका यानी 'कॉरिडोर' सुरक्षित था.... जहाँ से हाथियों के झुंड दूसरे राज्यों के जंगलों में जाया करते थे और फिर उसी रास्ते वापस अपने जंगल में आ जाते थे...... लेकिन, आबादी बढ़ी..... तो जंगल और ज्यादा कटे.... और परिणाम यह हुआ कि हाथियों के 'कॉरिडोर' में भी खेती होने लगी........  यही कारण है कि हाथियों के झुंड जब उस रास्ते से गुजरते हैं तो उन खेतों और रिहायशों की सहमत आ जाती है..... लोग, एक गाँव से हाथियों के झुंड को भगाते हैं... और झुंड दूसरे गाँव में घुस जाता है..... अलबत्ता, हाथी एक गाँव से दूसरे गाँव तक सिर्फ भगाए जा रहे हैं.....  वहीं, दिन भर कड़ी मेहनत, रात भर मशाल जला कर रतजगा और हर समय खौफ़, शायद यही लोगों की नियति बन गई है..... हाथी और इंसान की कहानी में आज अपना-अपना पेट पालने के लिए  दोनों एक-दूसरे के विरोधी हो गए हैं...... पहले इंसानों ने हैवानियत का परिचय देते हुए हाथियों को परेशान किया..... उनका और उनके बाल बच्चों का शिकार किया... फ़िर अब हाथी अगर, हमला कर रहे हैं तो इंसान परेशान हो रहे हैं... अब सवाल यह है कि आखिर गलती किसकी है.....? हाथी जाएं तो जाएं कहां...?  हाथियों के रहने और विचरण की जगह घटती जा रही है ..... जंगल और पानी के स्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं.... तो जाहिर है कि भोजन और पानी की तलाश में हाथी, आबादी वाले क्षेत्रों में आएंगे .......... वन्य जीव विशेषज्ञों ने जंगली हाथियों को दूर रखने के लिए तार लगाने, मिर्ची बम प्रणाली स्थापित करने, करंट वाली बाड़ों का इस्तेमाल करने जैसे अस्थायी उपायों पर काम ज़रूर किया है.... लेकिन सरकार और वन्य जीव विशेषज्ञ हाथियों को बचाने और पानी तथा जंगल पर उन्हें अधिकार वापस दिलाने की कोई भी योजना नहीं बना पाए हैं.....

क्या है हिग्स बोसन...?

माना जाता है कि भगवान कण-कण में बसते हैं.... और उन्हीं कणों से मिलकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति  हुई है......  शायद इसलिए, सबसे सूक्ष्म भौतिक कण में सबसे विराट आध्यात्मिक शक्ति की खोज हो रही है.... यही मान्यता है जिसके कारण, वैज्ञानिक हिग्स बोसन को ब्रह्मकण या ईश कण अथवा गॉड पार्टिकल कह रहे हैं.... क्या है हिग्स बोसन......? पार्टिकल फिजिक्स के अनुसार हिग्स बोसन वो कण हैं जो सब-एटॉमिक यानी परमाणविक जगत को मास यानी द्रव्यमान देते हैं..... यानी, अगर ये कण न हों, तो विज्ञान 'द्रव्य' की व्याख्या नहीं कर सकता..... नियम यह है कि अगर यह द्रव्यमान नहीं होगा तो किसी भी चीज के परमाणु उसके भीतर घूमते रहेंगे और आपस में जुड़ेंगे ही नहीं.... हिग्स बोसन के अनुसार, हर खाली जगह में एक फील्ड है.... साइंटिस्ट इसे हीग्स फिल्ड कहते हैं.... इसी फील्ड में हिग्स बोसन किसी अणु को भार प्रदान करते हैं..... लेकिन.... हिग्स बोसन की अहमियत क्या है....? फिलहाल हिग्स बोसन से भविष्य का कयास ही लगाया जा रहा है... लेकिन, अगर ये सच है तो इससे, इंटरनेट की स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी.... जिससे संचार क्रांति की दुनिया में कई महत्वपूर्ण  बदलाव आएंगे...., नैनो तकनीक में क्रांति आएगी.... जिससे एमआरआई और पीईटी स्कैन में हमें मदद मिलेगी.... वहीं, अन्तरिक्ष प्रोद्योगिकी  को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकेगा... संभव है कि हिग्स बोसन की मदद से भविष्य में अन्य ग्रहों के गूढ़ रहस्य से भी पर्दा उठ सके.....
1920 के दशक में भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस ने अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ इस तरह के भौतिक कणों की अवधारणा बनाई थी ..... उसके बाद 1964 में, स्कॉटलैंड के पहाड़ों में घूमते हुए ब्रिटिश भौतिक शास्त्री पीटर हिग्स ने एक ऐसे फील्ड की कल्पना की जो भारी कणों से युक्त हो..... फिर, करीब आठ साल पहले 2004 में ब्रिटेन स्थित बुकमेकर लैडब्रुक्स ने पांच भावी आविष्कारों पर अटकलें लगाईं... मसलन, मंगल के सबसे बड़े चन्द्रमा यानी टाइटन पर जीवन की उपस्थिति, गुरुत्वाकर्षण तरंगों का अस्तित्व, अंतरिक्ष से आती कॉस्मिक किरणों के स्रोत की जानकारी, परमाणु संलयन का व्यावसायिक उपयोग और हिग्स बोसन का रहस्य...... इनमें से चार पर अभी कुछ भी कहना शेष है... लेकिन जिनेवा स्थित "द यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च" यानी सर्न प्रयोगशाला ने हिग्स बोसन के रहस्य से पर्दा उठा दिया है.... ब्रह्मांड के सबसे सूक्ष्म पार्टिकल की खोज में, "सर्न" ने फ़्रांस और स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर प्रोटोन की टकराहट के लिए 27 किमी लम्बी, छल्लेदार सुरंग बनाई..... तकरीबन 500 अरब रुपये की लागत से हुए इस महाप्रयोग में 9300 चुम्बकों को 271.3 डिग्री सेल्सियस के तापमान में, प्रति सेकेण्ड 4 करोड़ प्रोटोनों से टकराया गया.... प्रोटोनों की टकराहट से पैदा हुए आंकड़ों में से 20 फ़ीसदी विश्लेषण सर्न ने किया.... और बाकी के 80 प्रतिशत आंकड़ों का विश्लेषण दुनिया के अन्य संस्थानों में भेजे गए.... और आखिरकार, हमें उस रहस्य का राज़ मिल गया.... जिसमें ब्रह्मांड का सच छुपा है..... लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि गॉड पार्टिकल यानी ईश कण या ब्रह्म कण की खोज से मानवता को क्या मिलने जा रहा है..... ?????

Friday, June 29, 2012

विपक्ष या शासक

शहर से सड़क तक....
सफ़र से मंजिल तक ......
आसमान जैसा बड़ा.... 
या पैसे जैसा छोटा......

कौन हूं मैं.....??????
भीड़ में चलता एक आम आदमी.... या, बुलंदियों पर बैठा एक खाश आदमी....
माचिस की तीली जैसी कोशिश 
या फिर
हारा हुआ एक शख्श 

इस दौड़ती-भागती दुनिया में एक अपने हिस्से की ज़िन्दगी जीता एक रिश्ता  
या सिर्फ एक किस्मत ???
कौन हूं मैं.... ??

रेत से खेलता एक बच्चा 
या 
मकसद से लड़ता एक खिलाडी....

दिल के बहाने हँसता एक शायर 
या 
दुनिया के बहाने हँसने का नाटक करता एक कलाकार....

सच को समझता एक इंसान 
या 
मात्र, झूठ में जीता एक नागरिक
कौन हूं मैं?

दर्पण से कल्पना को समझता हुआ...
या 
किताबों से सफलता को नापता हुआ
कौन हूं मैं????

चाहरदीवारी में मजबूर
या
मोहल्ले का हीरो 

एक सवाल
या 
एक जज 

विपक्ष 
या 
शासक 
कौन हूं मैं....??????

Saturday, June 23, 2012

भविष्य हम जैसा चाहते हैं.... और उसे कैसे साकार करें.... इसी मकसद से ब्राज़ील के शहर "रियो डि जेनेरियो" में रियो+20 सम्मेलन का आयोजन किया गया.....  20 से 22 जून तक चले इस सम्मलेन के घोषणापत्र में भारत की चिंताएं साफ़ झलकती हैं.... जिसमें कहा गया है कि विकासशील देशों को सतत विकास के लिए और संसाधनों की जरूरत है... साथ ही, आधिकारिक विकास सहायता यानी ओडीए एवं वित्त व्यवस्था पर अवांछित शर्तों से बचना चाहिए.... भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिखरवार्ता के दौरान अपने संबोधन में कहा कि अगर अतिरिक्त धन और तकनीक उपलब्ध हुई तो विश्व के कई देश अधिक विकास  कर सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इन क्षेत्रों में औद्योगिक देशों से समर्थन कम होता है...... भारतीय प्रधानमंत्री ने विश्व समुदाय को ज़िम्मेदारी का अहसास कराते हुए कहा कि यह वैश्विक समुदाय की जिम्मेदारी है कि सम्मलेन को कैसे व्यावहारिक स्वरूप दिया जाय..... ताकि प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप विकास करे.......  
वर्ष 1992 में रिओ-डी-जेनेरियो में पर्यावरण की रक्षा के लिए  'पृथ्वी सम्मेलन' हुआ था...... इस सम्मेलन के बाद 1997 में क्योटो संधि की शर्तें सामने आईं..... अलबत्ता, क्योटो संधि की शर्तों पर सख्ती से अमल की उत्सुकता किसी देश ने नहीं दिखाई..... सबसे बड़ा ग्रीन-हाउस गैस उत्सर्जक देश अमेरिका ने इस संधि से खुद को बाहर ही रखा...... और क्योटो संधि एक मखौल बनकर रह गई....... क्योटो के बाद 2007 में बाली में संपन्न बैठक भी बेअसर रही...... उसके बाद, संयुक्त राष्ट्र के बुलावे पर कोपनहेगन सम्मलेन क्योटो शर्तों की नाकामी को खत्म करने की एक उम्मीद के रूप में देखी गई..... लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात.... वहीं, अपने स्वार्थों को पर्यावरण से ज्यादा अहमियत देने वाला अमेरिका एक बार फिर रियो प्लस ट्वेंटी से बाहर है...... अब देखना यह है कि अमेरिका की गैरमौजूदगी में भारत, ब्राज़ील, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे देश प्रकृति को बचाने के लिए रियो+20 सम्मेलन को कैसे साकार करते हैं..... 
पिछले दो दशक में पर्यावरण को बचाने के लिए विश्व के ज़्यादातर देश एक मंच पर ज़रूर आए..... लेकिन अमेरिका की हठधर्मी के कारण पर्यावरण और विकास के बीच का हल नहीं निकला..... पर्यावरण बचाने की ये मुहिम 20 वर्षों में रियो से चलकर क्योटो, बाली, कोपनहेगन और फिर वापस  रियो तक आ गई..... फिर भी भविष्य हम जैसा चाहते हैं... उसपर संशय बरकरार है....

Wednesday, February 15, 2012

इतिहास की उलझन में "गांधी" और इसमें हमारा भविष्य

60 साल के बजाय अगर पिछले 70 सालों को लें तो भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में "गांधी" शब्द से बड़ा कोई और शब्द नहीं दिखता. लेकिन ये दौर फेसबुक, गूगल का है. फिलहाल गांधी कागज और कम्पूटर की दिवार पर चिपके मिलते हैं, इसलिए ज़रूरी नहीं है कि "गांधी" जीतेगा. दलदल में फंसे वर्तमान को अगर बेहतर बनाना है तो फिर से "सम्पूर्ण क्रांति" लानी होगी. यह तय करना होगा कि अब क्या करना है? इसमे दिलचस्प होगा कि नव उदारवाद के दौर में "जेपी" कौन होगा?  
हर वो सख्श जो कहता था दरियादिली की बात आज कठघरे में खड़ा मुस्कुरा रहा है....
मैं कुछ दिनों से गांधी और गोडसे के बारे मैं पढ़ रहा हूं, इतिहास मैं उलझनें बहुत हैं शायद यही वह वजह है कि कभी गांधी हिरो दिखते हैं तो कभी पक्षपात से ग्रसित एक राजनेता जो जानता है कि इमानदारी और हिम्मत को कैसे मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है. गोडसे संघ की चारदीवारी से बाहर रावण की भूमिका में है. कुछ जगहों पर मिलता है कि भारत में उस वक़्त की राजनीति में ४ मुख्य चेहरे थे. पहला, जवाहरलाल नेहरु जिनकी विचारधारा क्या थी पता नहीं चल पाता. वो क्या चाहते थे, किसके थे, किसके लिए थे वगैरह - वगैरह..  दूसरा, बाबासाहेब जिन्हें उस वक़्त समाज में प्रेरणाश्रोत बनना था, वो दलित उत्थान की बात कर हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ा बैठे. उसी वक़्त गोडसे कुछ उन चन्द लोगों में से थे जो हिन्दुओं को जोड़ने और बचाने में परेशान थे. और चौथे थे गांधी (मोहनदास करम चन्द गांधी). वैसे तो देश गाँधी का था लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि उस वक़्त की राजनीति ये चाहती थी कि गांधी ना रहें. गांधी पर एक सप्ताह पहले भी हमला हो चुका था फिर भी उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त क्यूँ नहीं हुआ इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता. गांधी हत्या की नैतिक ज़िम्मेदारी जवाहरलाल नहीं लेते हैं. मैं ये बिलकुल नहीं मानता कि गोडसे ने सही किया. लेकिन गलती गोडसे कि थी मैं ये भी नहीं मानता. मुझे लगता है गांधी खुद अपनी हत्या के ज़िम्मेदार थे, और दूसरी गलती नेहरु की थी. गांधी की हत्या के पीछे उनका मुस्लिम प्रेम था जिसका जिक्र कई जगह पर मिलता है. भाईचारा और इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले गांधी खुद इन्हीं वजहों से कठघरे में दिखते हैं. लोकतंत्र में हिंसक रवैया अपनाने वाले गोडसे भी कठघरे में दिखते हैं. नेहरु, बाबासाहेब, बल्लभ भाई पटेल सभी कंही न कंही वर्तमान भारत की दशा के लिए कठघरे में दिखते हैं. और सबसे बड़ा गुनहगार वो शब्द "गांधी" दिखता है जो कईयों को तोहफ़े में आजीवन मिला है. 
इतिहास में कई और उलझनें भी हैं, कहीं कहीं ये उल्लेख भी मिलता है कि नेहरु परिवार मुस्लिम से हिन्दू परिवर्तित है. जो मूलतः कश्मीर के थे और आगरा में बस चुके थे. इसे पिछले ६ दशकों में दबी कुचली ज़बान से बोला गया है. गोडसे में हैदराबाद के निजाम की वजह से मुस्लिम विरोध दिखता है जिससे आहत वो गांधी की हत्या कर बैठते हैं. बाबासाहेब  आज भी जिंदा दिखते हैं जब मायावती, मंडल और वामपंथी धडा अपनी राग अलापता है. और गांधी इस देश में सदैव ज़िंदा रहेंगे जिसका अनुमान भी इतिहास के इन्हीं पन्नों में मिलता है. नेहरु और गांधी की उपज इंदिरा थोड़ी सशक्त और जिंदादिल ज़रूर दिखती हैं लेकिन ये देश उनकी जागीर थी यह समझने की भूल वह भी कर बैठती हैं. राजीव, राहुल फ़िरोज़ गांधी के वंशज हैं लेकिन इतिहास उन्हें नेहरु के साथ देखता है. सोनिया भारत की हैं इसे लोकतंत्र तो मानता है लेकिन जनमानस नहीं. इतिहासकार और उस वक़्त के कई लेखक जिनके शब्द हमतक पहुँचते हैं उनकी बातें कुछ और होती हैं.  उनकी जीवनशैली, प्रतिष्ठा और नज़रंदाज़ी इतिहास के पन्नों में उलझन डालती है लेकिन जिन लेखकों की आवाज़ हम तक नहीं पहुच पायी इतिहास में वो आज भी नगण्य हैं. 
 ये उलझन आज़ादी की नीवं को कमज़ोर बनाती है इसलिए ज़रूरी नहीं है कि "गांधी" जीतेगा. दलदल में फंसे वर्तमान को अगर बेहतर बनाना है तो फिर से "सम्पूर्ण क्रांति" लानी होगी. सब कुछ फिर से बदलना होगा. यह तय करना होगा कि अब क्या करना है? इसमे दिलचस्प होगा कि नव उदारवाद के दौर में "जेपी" कौन होगा? 

Tuesday, February 14, 2012

Journey of My Love till the first Valentine


 "It is wrong to think that love comes from long companionship and persevering courtship. Love is the offspring of spiritual affinity and unless that affinity is created in a moment, it will not be created for years or even generations." Kahlil Gibran 
I am Confused, but its not the right time. Its a season of LOVE, so this time Me n My Journey towards Love.It started with my father, because he is the proof of my presence and then He gave me a name unfortunately it was "Prem". it wasn't the end. He putted one another word "Sagar" with this. Anyway it wasn't the certified till i was in the home, because i was a brilliant student and an angry child man. After 5th I went to hostel, and i think that was the time supported me what i am today & it leads to my name (Prem Sagar).
Patna, My first love. It wasn't from my side. It was a mistake of Saket, Sudhir & Ajay. But i apologize the mistake. Sorry. I never wanted anything. Actually till 2002 i wasn't able to know this word called Love. Neither with family nor with friends. I was selfish. still i am but that time i was child by brain at the age of 20. Now I am proud on myself and all the credit goes to few prettiest women, who came to my life and made me perfectly.
 As my Name goes to the "ocean of love" which first ever come to me at the age of 18th. I was failed in my Board exam and had been shifted to an another hostel where i met my first girl friend Anju 0r Deepmaala Singh Sengar, My first friend Ever and unfortunately She was a Girl. But she was in love with 4 guys at the same time. I counted her badly. But She was so nice to Me and that's what i wanted too. During these days I met a guy who was a Homo :) i wasnt involved obviously but that was the time i came to know a word called "Sex". Actually that was the first time i was changing. I was failed again in my board's exam and suffering from a big social problem. Anju is good, I hope. She is married and I Think!  She lives in Jamshedpur, anyway I came to patna in 2002 and falls in a misunderstanding because of few friends and it it was a physical attraction too.
Raipur wasn't an incident it was an accident. Which came it to me from other side and made me guilty. anyway this chapter i dnt want to discuss because i ended it few years back.
But after that two beautiful and most amazing people came to my life. One was a women who came to me just like a mother, a sister, a friend, a mentor, a companion. Initially i wasn't loved her She was my best friend and I am her too. She done mistake and braked the rule. We aren't together but we will be together always . Actually it wasn't just a love. She was my "Mum". My love was just a reflection of my regards. That was my first and last college days which was the revolution era of telecommunication. being a student, Being a friend, being a human it was an awesome period in my life. Thank You.  I am, What I am & its all because of u :)
By the way i haven't told you about my last lady. Actually she wasn't a lady. She was my kid. A girl, Who wasn't innocent, but a typical suburbs girl who knew everything. you cant make her fool. we never loved each other but it wasn't less then love & She wasn't like other girl I met ever. And She was, She is & She will be my best girl Friend.  Her Self respect, Her Soul, her Purity, her Brain everything which connects to her is checked and defined. Now She is vary mature but still so unpredictable. Thank You Phillips I dnt have words for you but you are the one who taught me perfection and how to proud. My Love, my availability will always guide you till my end. take care.
I am Married now and this is my first season of Love. Consider "Prem's Love" and you people will be Shocked and happy too. My philosophy leads to me a proud husband and on this valentine We will celebrate it Proudly. Initially i hated it because it came to me easily but Marriage is the best tutorial where any one can learn Love as a part of life. No attraction no fear. Happy Valentines Ladies. and Specially My Wife. Love You always :)))))
 Forget to mention my last valentine... Sorry Miss Jaipur :)  I'll remember CP n U always. take care

Sunday, November 27, 2011

If you do it right, once is enough


“You only live once, but if you do it right, once is enough.”  ― Mae West

Isn't it ? thoughts, words, feelings, decision & people the all surrounds us in a time period & we always in search of happiness lost to understand it.
Once i did Bio and wanna be a doctor. i wasn't. Then somebody met me in a train and had a bomb Idea, which changed my life. till that time I was no one. but after that i was someone. But now again I am No One.
Just like Chetan Bhagat's Five point someone, I was on the way of Delhi for a medical entrance exam. In passenger's list i was searching the name of people around me during the journey. for last seven years it was my good luck but for now it was my bad luck. I met a journo in front of my Berth. he was the first one who successfully scanned me and suggested me to become a journalist. when it comes to me i found myself very worth full, and so, i started dreaming my old BBC days.
Journey Begins
but my family wasn't sure that i should opt this. my father had few journo friends and they were (and still they are ) writing the truth for few bucks. I told him i m not that kind of person. I have my social values and respect so i'll never do this. but he wanted me to opt any government job and so, he suggested me to be a part of Banaras Hindu University ( where i was selected ) for my graduation course. i struggled too much for a world of fame, for taking a responsibility to change the look of nation and i decided to quit home.
I did this, and came back to Patna. and filled the form of Amity University, Raipur Campus. i was single son of my parents. so, I knew at some point they had to loose. and finally amity called me for an interview.
Raipur Days
I was n still I am poor in English, and first time i knew the power of it. but i won and interviewed in Hindi and enrolled for Mass Communication Course. i did it with lots of struggle. in terms of language, personality, money, government and relations. But for certain government policy i had to switch myself lucknow with bunch of my friends.
Lucknow Days
Lucknow changed my life. Madiha Hasan, Shinjini Singh, Harshita Talwar, Harsh Singh, Ashish Dixit and the most talented buddy Hem taught me at every point of mistake. they care me, they loved me and they made me, what I am today. Ashish tiwari, Stuti Bagrecha, Namrata srivastva, Monalika Ray, Nupur Gupta & Shriya sengupta few were more who loved me as i am. and support me all the time. But few people like Anita Gautam, Ashish Khare, Ritu Sen & Minisha Singh was the mentor who developed me as i was. in true meanings lko days made me Mad and still it continued.
Post Journalism and pre-communication Days
Mumbai to pune, pune to mumbai, mumbai to delhi, delhi to mumbai and finally mumbai to delhi.... Cinema my new buddy was at my head. I forget my past and started dreaming a prem called Director Prem. during these day i met with real world. pain, hunger, defeat, silence, loneliness and list goes on n on.......
Delhi could be a better start but unfortunately it couldn't. anyway I got Chhoti back in my life and Phillips and Hathi were in the package. thank God they still are with me.
But it wasn't beautiful. Optimism is good all the time but at the end result matters.
Signing out
Take care.

Saturday, September 3, 2011

राजनेताओं के खेल में फंसा विधेयक


कहा और माना जा रहा है कि युवा इस देश की किस्मत लिखंगे . कई हैं जो इस रास्ते पर चल भी रहे हैं. ताजा उदाहरण युवा एवं खेल मंत्रालय संभाल रहे दिल्ली के युवा नेता अजय माकन की करते हैं.  दिल्ली के निवासी और राष्ट्रमंडल खेलों को नजदीक से देखने वाले माकन ने भारतीय खेलों की नसीब लिखने का बीड़ा उठाया और खेल विधेयक को संसद में लेकर आए. पर उन्हें वापस उसी रास्ते पर भेज दिया गया जिस रास्ते से चलकर कभी 8 ओलंपक स्वर्ण जीत चुकी भारतीय हॉकी चलती आ रही है. ये क्यों और कैसे हुआ ये समझना ज़रूरी है. सिक्के के तीन पहलू हैं. पहला अजय माकन जो युवा राजनेता हैं और कांग्रेस पार्टी के दिल्ली से संसद हैं. माकन पहली बार चर्चा में तब आए थे जब शिला दीक्षित  ने अपने मंत्रिमंडल में माकन को ट्रांसपोर्ट, पॉवर, और टूरिज्म मंत्रालय का कार्यभार दिया था. 2001 में मंत्रालय मिलते ही माकन ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाली गाड़ियों के लिए सीएनजी के प्रयोग से दिल्ली के वायुमंडल को ज्यादा प्रदुषण से बचाने तथा पेट्रोल और डीजल पर बढ़ रहे बोझ से मुक्ति दिलाई.  इस बार माकन ने खेलों के वायुमंडल में फैले प्रदुषण को हटाने की कोशिश की थी. पर यंहा सिक्के के दुसरे पहलू में बैठे लोग थे. खेल संघों के कार्यकारणी में बैठे लोग. अगर आज़ाद भारत का इतिहास उठा कर देखा जाए तो इन्ही लोगों के कारण भारतीय खेलों का पतन दिखता है. केन्द्रीय या राज्य स्तरीय खेल संघो में राजनेताओं और उद्योगपतियों की जमात है जो कई सालों से कब्ज़ा जमाये बैठे हैं, और इन्हीं संघों में पूर्व खिलाड़ियों की उपस्थिति अंगुलियों पर गिनी जा सकती है. यही वजह बनती है खेलों में भ्रस्टाचार पनपने की. खेलों पर राजनीतिक ज़मावड़े के कारण माकन की कोशिश थी कि खेल संघों को सुचना के अधिकार कानून के तहत लाया जाए जिससे इसमें पारदर्शिता लाई जा सकती है. साथ ही कार्यकारणी में 25 प्रतिशत से ज्यादा वो लोग हों जो कभी संबंधित खेल से खिलाड़ी के तौर पर जुड़े रहे हों. पर ऐसे कदम से उन राजनेताओं की रोजी रोटी बंद हो जाएगी जो खेल संघ के पद पर रहते हुए मोटी कमाई करते हैं  और प्रोफाइल को समाज में कैश कराते हैं. 
ज़रा ध्यान दीजिये शरद पवार (क्रिकेट, महाराष्ट्र ओलंपिक संघ ), सुरेश कलमाड़ी (ओलंपिक), विजय मल्होत्रा (तीरंदाजी), अभय सिंह चौटाला (बॉक्सिंग), जगदीश टायटलर (जुडो), अखिलेश दास (बैडमिन्टन, उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ), प्रफुल पटेल (फ़ुटबाल), यशवंत सिन्हा (टेनिस), बिरेन्द्र प्रताप वैश्य (वेटलिफ्टिंग), तरुण गोगोई, रोक्य्बुल हुसैन ( असम ओलंपिक संघ ), रमण सिंह ( छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ ), जे पी नद्दा, ( हिमाचल ओलंपिक संघ), रमेश मेंडोला ( मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ ), बिजोय कोइजम (मणिपुर ओलंपिक संघ), लाल थान्ह्वाला (मिजोरम ओलंपिक संघ), नेइफिउ रिओ (नागालैंड ओलंपिक संघ), समीर डे (उड़ीसा ओलंपिक संघ), सुखदेव सिंह धीधंसा (पंजाब ओलंपिक संघ), फारूख अब्दुल्ला (जम्मू एवं कश्मीर क्रिकेट संघ ), सी पी जोशी ( राजस्थान क्रिकेट संघ ), विलासराव देशमुख (मुंबई क्रिकेट संघ ), ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ ), राजीव शुक्ला (उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ ), अरुण जेटली (दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ), नरेंद्र मोदी (गुजरात क्रिकेट संघ), दयानंद नार्वेकर (गोवा क्रिकेट संघ) और अनुराग ठाकुर ( हिमाचल क्रिकेट, ओलंपिक संघ ) जैसे व्यक्ति राजनेता हैं. इनके अलावा पंजाब के आई एस बिंद्रा, विदर्भ के प्रकाश दीक्षित, सौराष्ट्र के भारत शाह, बंगाल के जगमोहन डालमिया, केरल के टी आर बालाकृष्णन, झारखण्ड के अमिताभ चौधरी, आंध्र प्रदेश के डी वी सुब्बाराव समेत सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी किसी राज्य या राष्ट्रिय स्तर का कोई भी खेल नहीं खेला है सिवाय खेल संघों में बैठ कर खिलाड़ियों के भविष्य के साथ खेलने के. 
खेल विधेयक को लाने में जिस तीसरे पहलु से माकन को सबसे ज्यादा मुंह की खानी पड़ी वो बीसीसीआई है. राजनेताओं और उद्योगपतियों के भरमार होने के बावजूद  बीसीसीआई एक सफल संस्था है जिसने भारतीय क्रिकेट को वाकई नया आयाम दिया है. फिर भी सच्चाई यह है कि क्रिकेट का भी जीवनपर्यंत भला तभी संभव है जब इसे रेगुलेट करने वाले लोग क्रिकेटर हों. बीसीसीआई में काबिज एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला, अरुण जेटली जैसे लोगों के पास और भी कई काम है मसलन वकालत, उद्योग, देशवासियों का विकास वगैरह, वगैरह. पूर्व क्रिकेटर जो सन्यास के बाद खाली बैठे हैं वो भारतीय क्रिकेट को ज्यादा समय दे सकते हैं. खेल विधेक में  माकन का नज़रिया एक हद तक जायज है. कार्यकारणी में 25 प्रतिशत से ज्यादा खिलाड़ियों के होने से खिलाड़ियों के नज़रिए को मजबूती मिलेगी एवं उनकी खेलों को लेकर समझ क्रिकेट के भविष्य को और भी बेहतर बनाएगी. और जंहा तक सवाल है सुचना के अधिकार की तो बीसीसीआई से जुड़े और खेल विधेयक का विरोध कर रहे लोगों को ये मालूम होना चाहिए कि फिलहाल धोनी बीसीसीआई के कप्तान नहीं हैं बल्कि भारतीय टीम के कप्तान हैं. सचिन बीसीसीआई के लिए नहीं खेलते वो प्रभाष जोशी जैसे उन दर्शकों के लिए खेलते हैं जिन्हें सचिन के आउट होने पर हार्ट अटैक आ जाता है. भारतीय टीम में खेलने वाले और इन्हें रेगुलेट करने वालों पर सूचना लेने का अधिकार है देशवासियों को. ये राजीव शुक्ला तय नहीं कर सकते यह दर्शक तय करेंगे.  अजय माकन के प्रयास को सबसे ज्यादा विरोध का सामना बीसीसीआई और ओलंपिक संघ का करना पड़ा. लेकिन ओलंपिक संघ के कार्यकारणी के इतिहास पर  ज़रा नज़र डालिए. दोराबजी टाटा 10 साल, महराजा भूपिंदर सिंह 10 साल, महराज भूपिंदर सिंह के बड़े बेटे महराजा यादविंद्र सिंह 22 साल एवं छोटे बेटे भालिन्द्र सिंह 19 साल, ऑम प्रकाश मेहरा 4 साल, विद्या चरण शुक्ला 3 साल, सिवंती अदिथन 9 साल, सुरेश कलमाड़ी 15 साल.  और इतिहास के पन्ने को एक बार फिर पलटिये ये जानने के लिए कि क्रिकेट और हॉकी को छोड़कर खेलों में हमने किया क्या? 
लेखक वॉयस ऑफ मूवमेंट दैनिक अखबार के समाचार सम्पादक हैं. 

Sunday, August 14, 2011

किस्मत और उम्मीद


आज़ादी तय थी इसलिए हमें मिली. ये शब्द मेरे नहीं बल्कि आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के थे. पर प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने अपने पहले भाषण में "किस्मत" के अलावा एक और महत्वपूर्ण शब्द का प्रयोग किया था, "उम्मीद". उम्मीद एक बेहतर राष्ट्र निर्माण की. कंहा हैं बेहतर राष्ट्र ? और ये सवाल अब किससे किया जाय ? पंडित नेहरु की आत्मा से या उनके वंशजों से, जो आज भी उम्मीद की बात करते हैं. भविष्य की किस्मत को अगर वर्तमान की उम्मीद के तौर पर देखें तो पंडित नेहरु समेत तमाम लोग जिन्होंने देश की बेहतरी की बात की, बेईमान लगते हैं. 
मैं सुबह घर से निकलता हूं और दिनभर हिन्दुस्तान की गलियों में, घरों में घूमता रहता हूं. दुकानदार को जब बेचता देखता हूं तो वो कोई और दिखता है जब उसे खरीददार बना देखता हूं तो वो कोई और दिखता है. नेताओं को जब बोलता हुआ देखता हूं वो कोई और होता है जब उसे किसी राजनितिक समीकरण बनाता देखता हूं वो कोई और होता है. मैं दुखी ज़रूर हूं पर भ्रस्टाचार से नहीं और ना ही  भ्रस्टाचारियों से. यहां तो हर कोई भ्रस्ट है. दुखी इस बात से हूं कि मैं यंहा हर रोज़ अपने उम्मीद को हारते देखता हूं.  पुलिस की मजबूरी  से दुखी होता हूं. वकीलों के तर्क से दुखी होता हूं. मीडिया के नज़रिए से दुखी होता हूं. हमारे ऑफिस में 4000 की पगार पर दिन भर मेहनत करने वाले एक सहयोगी को अपनी बहन की शादी के दहेज़ के लिए ज़मा करते पैसे से हतप्रभ होता हूं. 
हां, जंग में कुर्बानियां होती हैं और इस बात का अफ़सोस उन्हें भी नहीं था जो शहीद हो गए. पर इस बात की ख़ुशी उन्हें मिल गई जो जिन्दा बच गए थे. आज़ादी की लड़ाई को उन लोगों ने हर गली, हर मोहल्ले में कैश किया. पंडित नेहरु की उम्मीद कंहा चली गई जब उनके वंशजों के शासन काल में पुणे में एक और जालियांवाला नरसंहार हुआ. क्या नेहरु को नहीं मालूम था कि ६ दशक बाद उनकी उम्मीद क्या रूप अख्तियार करेगी. खूलेआम डकैती हो रही है, लूट हो रही है, बलात्कार हो रहे हैं. शासन भ्रस्ट है. प्रशासन मजबूर है. क्रिमिनल आज़ाद हैं. आम नागरिक परेशान हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं. राजनेता एक दुसरे पर सिर्फ आरोप प्रत्यरोप कर रहे हैं. क्या नेहरु की उम्मीद यही थी. अगर यही थी तो राहुल गांधी की उम्मीद का क्या रूप होगा उसका अनुमान किसी भी  देशभक्त के रोंगटे खड़ा कर सकता है. कंहा होंगे हम अगले ६ दशक में. अरबों की आबादी, अशिक्षा, बेरोजगारी कुछ भी नियंत्रण में नहीं है. और अब ना तो समाज रहा ना ही अनुशासन. गांव अब शहर आ चुका है, शहर में पैर रखने की जगह नहीं है. शहरों में संसाधन नहीं हैं. गांव में जंहा मौजूद संसाधनों को विकसित किया जा सकता है वंहा वितरण की कोई नीति नहीं है. 
ज़रा फ़र्क देखिये गुलाम और आज़ाद भारत में, कल जब मराठावाद की गूंज उठी थी तब मकसद अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना था, आज़ाद भारत का मराठावाद अब अपने ही देश में अलगाव पैदा कर रहा है. कल तक जिनके चेहरे से नफरत थी हमारे पूर्वजों को आज उनके बनाये फास्ट फ़ूड हमें रोटी दाल से अच्छे लगते हैं. कल विरोध का मतलब था सुख, शांति, चैन आज विरोध का मतलब है स्वार्थ, अपनी ख़ुशी. एक हद तक ये गलत भी नहीं है पर फिर देश, समाज, विकास के ये खाखोसले ढोंग क्यों ? भारतीयों से बेहतर भारत को मैकाले ने समझा था जिसका परिणाम हमारे सामने है. ना हमारी भाषा, ना हमारी संस्कृति हमारी संपत्ति है. सब खत्म हो गया, अंग्रेज गए अपनी अंग्रेजी छोड़ गए. 
जात पात, उंच नीच, छोटा बड़ा, गाँव, शहर, मोहल्ला, मर्द, औरत, मालिक, नौकर, सीनियर, जूनियर और ना जाने कितने उपनामों से हमने खुद को एक दुसरे से अलग कर रखा है. और अनेकता में एकता का पाठ पढ़ाकर बौद्धिक जुगाली में खुश होते हैं हम. कोई जन लोकपाल बिल इस देश को नहीं बदल सकता. और न ही कोई अन्ना हमारा नसीब लिख सकता है. इस देश को हम खुद बदल सकते हैं. पर इसके लिए हमें बदलना होगा. औरों को परखना बंद करना होगा. खुद को शीशे के सामने रख खुद के अन्दर के कलमाड़ी और ए राजा की पहचान करनी होगी . 

Thursday, July 7, 2011

आधी आज़ादी


कहते हैं कि एक कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल जाता है. गाँव की यह कहावत नव उदारवाद युग के विकास में चरितार्थ होने लगा है. भट्टा परसौल भले ही इसका ताज़ा उदहारण हो लेकिन अगर गुजरे वक़्त को देखें तो कई ऐसी घटनाएँ दिखती हैं जिसने उदारवाद के बहाने लोगों को अपने मूल से अलग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अगर इस पूरे प्रक्रिया में किसी का नुकसान होता है तो वह सिर्फ और सिर्फ किसान हैं जो ज़्यादातर अशिक्षित हैं और आर्थिक युग में पैसे से कमज़ोर हैं. विकास के नाम पर इन्हें इनकी ज़मीन के बदले पैसे दे दिए जाते हैं और उन ज़मीनों पर उद्योगों को स्थापित किया जाता है. उपरी तौर पर देखा जाय तो किसानो को ज़मीन के बदले पैसे भी मिल जाते हैं और विकास भी होता है जो वैश्विक स्तर पर सही भी है, पर मूल रूप से कटते किसान के हालात ज्यों के त्यों बने रहते हैं. समय के साथ ना इनके पास ज़मीन बचती है ना विकसित राष्ट्र का हिस्सा बन पाते हैं. हाँ, इस दौरान आत्मविहीन राजनीति अपना फायदा ज़रूर निकाल लेती है. चाहे सिंगूर हो, विदर्भ हो, बुंदेलखंड हो, मेवात हो या फिर भट्टा परसौल हो, हाई  एक्शन मेलोड्रामा वाली इन फिल्मों का प्लाट लगभग एक ही है. उद्योगपति सरकार या फिर सबंधित मंत्रियों को पैसा देती है और फिर विकास के नाम पर हमेशा से किसान लूटते रहे हैं. बेशर्म राजनेता हर और से सिर्फ अपने फायदे की जुगत में लगे रहते हैं.

सन 1527 में बाबर के खिला़फ ल़डते हुए एक ही दिन में 12 हज़ार मेवाती योद्धा शहीद हो गए थे. शहीद इसलिए हुए थे क्योंकि अपनी ज़मीन को विदेशी दुश्मनों से बचाना था. लेकिन अब अपनी ज़मीन बचाने के लिए मेवात के लोगों के पास इतिहास दोहराने का भी विकल्प नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में सशस्त्र संघर्ष की अनुमति नहीं है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की गूंज सरकारी दरवाज़ों को भेद नहीं पाती. किसानों के दुख और ग़ुस्से का एक ही रंग है स्याह, पर बोलियाँ अलग अलग हैं. मजबूर लोग ताउम्र संघर्ष करते रहते हैं और विरोध करने वालों को उग्रवादी के नाम से पुकारा जाने लगता है. विकासशील से विकसित होते भारत के एक मुहाने पर किसान बैठे हैं और दूसरी तरफ इनके प्रयोग करने वाले जो उदारवाद के नाम, समय - समय पर इनको चूसा करते हैं.  हाऊसिंग सोसाइटी, हाई वे, रेस ट्रैक, शॉपिंग मॉल्स, स्टेडियम, आइ टी हब्स और गोल्फ कोर्स में तब्दील हो चुके खेत अब गाँव को हरियाली नहीं दे पा रहे हैं.  उठते ज्वार की तरह आधुनिक जमाने की ये सुविधाएँ गाँवों को खत्म करते जा रही है. अब ये वीरान टापू की शक्ल ले चुके हैं कोई शक नहीं कि आने वाले ५० -६० सालों में कोई किसान बचे ही नहीं.  जिन हालात में रहकर किसान संघर्ष कर रहे हैं या तो वो कुपोषण से मारे जायेंगे या लोकतंत्र का ये बिगडैल तंत्र उन्हें अगले ५-६ दशक में गोलियों से भून डालेगा.
टप्पल, हमीदपुर, भट्टा परसौल देश कि राजधानी से मात्र १०० किलोमीटर की दुरी पर हैं पर विकास को आधार बनाकर देख जाय तो सदियों पीछे दिखेंगी. ना तो वंहा इलाज़ की समुचित व्यवस्था है और न तो शिक्षा के बेहतर केंद्र. एक तरफ विकास की बात हो रही है तो दूसरी और पिछडापन का नज़ारा है. सडकें गॉवों से शहरों तक आयें तो इसे विकास कहा जा सकता है लेकिन सडकें शहरों से गॉवों तक आ रही हैं तो कहा जा सकता है कि ये गलत नीयत से आ रही हैं । विकास स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन विकास का नारा लगाकर चुनाव जीतने वाले लोग हमें बताते हैं कि सडक, कार, मोबाइल या फिर ऐसी ही दूसरी चीजें विकास है तो यह क्यों छुपाते हैं कि इनमें से कौन सी चीज हमने विकसित की है। सरकारें सिवाय दूसरे देशों के माल को अपने यहॉ खपा कर बदले में अपनी प्राकृतिक सम्पदा और धन अकूत मात्रा में बाहर के मुल्कों को देने के अलावा कुछ नहीं कर रही है। विकास क्या है ? उपभोक्ता बनकर खरीददारी करना या वस्तुओं का निर्माण कर उसका बेहतर बाज़ार बनाना. विकास के बहाव में ज़िन्दगी को क्यूँ नीरस किया जा रहा है. ऊँची ऊँची दीवारों से विकास संभव नहीं हो सकता. किसी भी देश का विकास वंहा रहने वाले लोगों से होता है. लोगों का विकास ६ लेन रास्तों या रेस कोर्स से नहीं हो पायेगा. बारात आज भी अपनी मूलभूत समस्याओं से लड़ रहा है. हमारे पास स्कूल, अस्पताल और यातायात के उचित साधन नहीं हैं. पहले इन्हें स्थापित करना होगा. इनसे मनुष्य का विकास होगा. फिर ये विकसित मनुष्य विकसित राष्ट्र बना पाएंगे. नहीं तो किसी दिन कोई सुनामी या फिर पाकिस्तान या चीन का मिसाइल इन ऊँची ऊँची इमारतों को ढाह देगा और हम उस दिन फिर संघर्ष करते नज़र आयेंगे. शहरों की अनियंत्रित भौतिक ख्वाहिशें गांवों की खांटी पहचान को निर्ममता से लील रही हैं  और ये सब वह सरकार कर रही है जो हमारी चुनी हुई कही जाती है.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भूमि अधिग्रहण से संबंधित वर्षों पुराने कानून के संशोधन की दिशा में कोई कदम नहीं उठाती है और राहुल गांधी उसी कानून के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं, लेकिन सिर्फ वहीं, जहां गैर कांग्रेसी दलों की सरकार है. किसानों पर फायरिंग होती है, किसान मरते हैं, औरतें विधवा होती हैं, बच्चे अनाथ होते हैं, तब राहुल गांधी उनकी खबर लेने नहीं जाते. मगर जैसे ही धारा-144 हटा ली जाती है, वह फौरन पहुंच जाते हैं, मानो आग ठंडी होने का इंतज़ार कर रहे हों और फिर राख के ढेर से चिंगारी तलाश कर उसे भड़काने की फिराक में हों, जिस पर वह अपनी सियासी रोटियां सेंक सकें. घर घर जाकर  रोती-बिलखती महिलाओं एवं बच्चों से मिलकर उन्हें सांत्वना देते हैं, उनके दु:ख-दर्द बांटने की कोशिश करते नज़र आते हैं. वह किसानों की मांगों के समर्थन में धरने पर भी बैठ जाते हैं और मीडिया में सु़र्खियां बटोरने में कामयाब भी हो जाते हैं. अगर वाक़ई वह किसानों के सच्चे हितैषी होते तो गांव भट्टा जाने के बजाय सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय जाते और भूमि अधिग्रहण क़ानून के संशोधित विधेयक को पारित करने की कोशिश करते. सच्चाई यह है कि राहुल गाँधी नहीं चाहते यह मुद्दा सुलझे नहीं तो भ्रस्टाचार के आरोपों से लड़ रही कांग्रेस को ध्यान भटकाने के लिए कोई और मुद्दा आगामी उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव तक नहीं मिलेगा साथ ही इसी मुद्दे के सहारे वो सत्तासीन बहुजन समाजवादी पार्टी पर हमला करते रह सकते हैं. पर जनाब, आप पर ये सोभा नहीं देता. जिस युवा नेतृत्व के नाम पर आपने शुरुवात की थी वो खत्म हो चुका है, और इसे किसी और ने नहीं बल्कि आपकी अज्ञानता ने किया है. आप इंदिरा गाँधी के परिवार से ताल्लुक रखते हैं ये देश आपका जागीर है. भले ही आप पूर्ण रूप से आज़ाद हों पर आधी आज़ादी में जीने वालों के मर्म को आप नहीं समझ सकते. पढ़े - लिखे हो, कम से कम सच तो बोलना सिख जाओ. क्यूँ नहीं बताते आप कि सिर्फ आपका पोलिटिकल अजेंडा है. बताओ लोगों को कि किसानों के नाम आप सिर्फ राजनीति कर रहे हों... तब इस देश के युवा आप पर भरोषा करेंगे.

Thursday, June 30, 2011

लौट आओ बापू

पर इस बार अहिंसा नहीं सकरात्मक प्रतिरोध को साथ लेकर आओ, क्युंकि ये पत्थरदिल लोग अहिंसा की बात नहीं समझते.
सत्याग्रह के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता महात्मा गाँधी आज फिर आपकी ज़रुरत है. राष्ट्रपिता का दर्ज़ा देकर, आपकी फोटो नोटों में देकर, आपके नाम से गलियों का नाम रख और आपके नाम से मैदानों का नाम रख लोगों ने आपके आड़ में क्या क्या किया और क्या क्या कर रहे हैं आप नहीं जान सकते. कोई भगवान या खुदा नहीं है जो देख रहा हो. पर बापू अगर आना तो इस बार अहिंसा के साथ मत आना नहीं तो हार जाओगे. आपने जिस हिन्दुस्तान का सपना देख उसे आज़ाद करने में अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी थी उसके लोग अब सिर्फ हिंसा की जुबान समझते हैं.
बापू तेरे पदचिन्ह आज भी अछूते हैं क्युंकि उसपर कोई चला ही नहीं. २ अक्टूबर को दारु की दुकाने बंद तो रहती हैं पर अगर आप आओगे तो मैं आपको दिखलाऊंगा यंहा हर गली, हर मोहल्ले में उस दिन ब्लैक में दारु मिलती है. खैर बेचने वालों की बात छोडिये ये धंधा है उनका, आखिर पापी पेट का सवाल जो है. पिने वालों की बात करते हैं. जब आप जिंदा थे तो लोग गंगा जल पीते थे कि अमर हो जाएँ अब गंगा नहाने के लायक भी नहीं है मजबूरन लोगों ने रम, वोदका और विस्की का सुबह से शाम तक सहारा ले लिया है. काश आप आज के दिनों का अखबार पढ़ते कल तक जंहा अखबारों में विचारों और सिधान्तों कि जगह होती थी आज उनमें सिर्फ हत्या, लूट, बलात्कार और भ्रस्टाचार सना होता है. अब अधिकारों के लिए कोई नहीं लड़ता बापू, किसी को फुर्सत नहीं है, वास्तव में आज़ाद जो हो गए हैं. आज़ादी से याद आया, क्या खूब आज़ादी दिलाई आपने. लोग अब कंही भी कभी भी किसी का बलात्कार कर लेते हैं, हत्या कर देते हैं, अब चोर रहे ही नहीं सब डकैत हो गए हैं. इतनी बेहतरीन आजादी शायद दुनिया में कंही नहीं होगी. भेदभाव की बात ही छोड़ दो, एक आप थे जो सर्वजन कि बात करते थे दूसरी मायावती हैं जो आजकल मुख्यमंत्री हैं एक प्रदेश की वो बात करती हैं. फ़र्क सबको मालूम है बताने की ज़रुरत नहीं है.

मैं सूट, कोट, जिन्स जैसे पश्चिमी कपड़ों का विरोधी नहीं पर आपको बताते चलूँ आपके विकसित भारतीयों को कुरते और धोती से नफरत होती है जिन्होंने आजतक धोती नहीं छोड़ी है उन्हें हीन भावनाओं से देखा जाता है. खैर आज़ाद देश है कुछ नहीं कह सकते, पर भाषा को तो देखो हिंदी लोगों को आती ही नहीं. हाँ, याद आया इस बार आना तो अपने आप को बदल कर आना. अधनंगे होकर हिंदी में इमानदारी की बात मत करना इस बार सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी चलेगा और कुछ नहीं. अब संघर्ष के मायने बदल गए बापू, महंगाई जो इतनी बढ़ गई है. आपके चरखे से निकला खादी अब ब्रांड हो गया है. इसे वही लोग बेचते हैं जिनको आपने खदेड़ कर भगाया था.

अब आपके कांग्रेस में कोई गोपाल कृष्ण गोखले नहीं रहे अब यंहा सिर्फ १० जनपद है जंहा से आदेश पारित होता है. एक आप थे जो कहते थे भारत को समझाने के लिए भारत भ्रमण ज़रूरी है, आज हालात यह है कि १० जनपथ का भ्रमण हो गया तो वो अरबों का मालिक बन जाता है. हाँ, भ्रमण से याद आया अब पैदल भ्रमण नहीं होता बापू, बड़ी - बड़ी गाड़ियों के काफिला में आज के समाजसेवक मिडिया वालों के साथ बात करते - करते भ्रमण किया करते हैं. गर्मी बढ़ गयी है न चेहरा काला हो जाता है. आपको याद दिलाऊँ, आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि जिस चंपारण से मिली थी उस प्रदेश की बात करते हैं. उसकी राजधानी पटना में आपके नाम से एशिया प्रसिद्ध सेतु है. पिछले २५ सालों से उसकी तबियत ख़राब है. प्यासा है, विकलांग है. खैर जब आओगे तब मैं आपको ले चलूँगा. जंहा तक मुझे लगता है इस बार भी आपका आन्दोलन वंही से शुरू होगा, पर इस बात के लिए नहीं कि सेतु ठीक हो जाये बल्कि इसलिए कि सेतु से आपका नाम हटे. बिहार आया तो एक बात और बताते चलूँ. आप, लाल बहादुर शास्त्री और सरदार पटेल किसानों को निर्भर बनाने कि बात करते थे आज का हाल तो देखिये किसानों के पास खेत रहे ही नहीं उनपे ऊँची - ऊँची इमारतें बन गयी और जो खेत बच गए उनपर खेती करने के लायक किसान नहीं बचे, क्या करें मंहगाई जो इतनी है.

पता है ये सब क्यूँ हुआ?, क्युंकि आपने तब अपना पूरा ध्यान भारत के भविष्य के बजाय सिर्फ आज़ादी प्राप्त करने पर दी थी. क्यूँ सह दिया था आपने इस कांग्रेस को? जिन गोरों को आपने भगाया था ये उन्हें विकसित मानकर उनके पीछे चलने के आदि हो गए हैं. लार्ड मेकाले याद है आपको, कितना मजबूर होकर लन्दन लौटा था वो हमारी भाषा, संस्कृति और संगठित समाज से हारकर. आप गए और वो खुद ब खुद जीत गया बापू. ना हमारी भाषा रही, ना संस्कृति ना समाज. समाज की छोडो अब घर नहीं रहा. २/२ के फ्लैट अब लोगों को आज़ादी का अहसास दिलाते हैं. अनसन और सत्याग्रह करो तो लाठियां चलाती है आपकी ये कांग्रेस. एक आप थे जो जवाहरलाल नेहरु के लिए बोलते थे एक दिग्विजय सिंह हैं जो राहुल गाँधी के लिए बोलते हैं. वैसे आजकल एक और राजनीतिक पार्टी भी है जिसे भारतीय जानता पार्टी के नाम से जानते हैं. मैं आपको ले चलूँगा इनके बड़े - बड़े मठाधीशों के पास. आपका हे राम शब्द के साथ अंत हुआ था, इनकी शुरुवात यंही से हुई. वैसे इस बार जब आप आयेंगे तो आपको यंहा राम मिलेंगे नहीं, उनका इनलोगों ने भरपूर प्रयोग कर लिया है जिससे उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया है. अब वो भी पत्थरों के सहारे अंध विश्वासी लोगों को विश्वास दिलाते रहते हैं.

अब ज़रा आपके अपने सिद्धांतों का हाल देखिये. आप सत्य की व्यापक खोज में ज़िन्दगी भर स्वयं की गलतियों और खुद पर प्रयोग करते हुए सिखा, आज लोग सत्य से भागने के लिए किसी और पर गलती मढ़ देते हैं. एक आप वकील थे और एक आज के वकील हैं सत्य - असत्य इनकी मुट्ठी में है. अहिंसा और अप्रतिकार बिलकुल नहीं बापू. अब सिर्फ प्रतिकार, विरोध, बदला और हिंसा का ज़माना है. प्रेम आज निष्क्रिय है अत्याचारी ही विजय होते हैं, एक दो नहीं आप आओगे तो देखना यही सिस्टम है यही सच्चाई है. एक आँख के लिए दूसरी आँख दुनिया को अँधा बना तो रही है पर इनका क्या करें बापू ये सारे जन्मजात ही अंधे हैं. आपकी ये पंक्ति अब दूरदर्शी नहीं दिखाई देती लोगों को. आपके आज़ाद भारत में पुलिस जनता की या जनता के लिए नहीं है. पुलिस सरकार की सेवा कर रही है.

इसलिए बापू आना ज़रूर. कई ऐसे भी हैं जो मजबूर हैं जिन्हें आपकी ज़रुरत है. पर किसी अंग्रेजी लिबास में, बिलकुल आक्रामक अंदाज़ में. अब इज्ज़त नहीं डर से काम होगा. जब तक लोग डरेंगे नहीं, इज्ज़त करेंगे नहीं. आपके प्रिय तुलसीदास भी कह गए हैं, "भय बिनु होई न प्रीत".

Sunday, June 26, 2011

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

आपातकाल भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 21 महीने का वह समय जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा की थी। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह सबसे विवादास्पद समय माना जाता है। 1974 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयप्रकाश नारायण ने अपना बनवास तोड़कर फिर से लोक मोर्चा की कमान संभाली थी। जेपी ने गुजरात में नौजवानों के आंदोलन को अपना समर्थन दिया तथा उसी तर्ज पर उन्होंने बिहार के नौजवानों को आगे बढ़ने का आह्वान किया था। मई 1974 में भारत के रेल मजदूरों ने जोरदार आंदोलन कर भारत सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। 1971 के चुनाव में दो-तिहाई बहुमत से जीतने वाली इंदिरा गांधी की सरकार पर चौतरफा हमले शुरू हो गए थे। रायबरेली से 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ समाजवादी राजनारायण चुनाव तो हार गए थे, लेकिन उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनाव याचिका के जरिए इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती दे डाली थी। कांग्रेस पार्टी के लिए वह सबसे बुरे दिनों में से था पर शायद  सही मायने में लोकतंत्र जीत रहा था. 
सत्ता की लालच, अहंकार और कमज़ोर विपक्ष के कारण इंदिरा को इस बात का एहसास तक नहीं था कि वो क्या कर रहीं थी पर समाजवाद के नाम पर लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रहे तमाम नेताओं को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि तानाशाह इंदिरा उनके साथ क्या सलूक कर सकती थी.  इतिहास गवाह रहा है, व्यक्ति और समूह कितना भी शक्तिशाली हो, इतिहास की आंधी से कोई नहीं बच सकता। साधारण व्यक्ति का प्रयास भी चट्टानी सत्ता को धराशायी कर सकता है। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक तरफ जंहा तिनका पहाड़ का रूप ले रहा था इंदिरा और कांग्रेस रुपी पहाड़ अपने पतन की और जा रहे  थे. बगैर किसी परवाह के इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति और राज्यों के मुख्यमंत्री पद पर अपने सुभचिन्तकों को बैठाना शुरू कर दिया. मजदूर, किसान, युवा सभी सरकार के खिलाफ खड़े होने लगे. एक तरफ जार्ज फर्नांडिस के नेतृत्त्व में रेलवे के १७ लाख कर्मचारी हड़ताल पर बैठ गए वंही दूसरी तरफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्त्व में बिहार में छात्र आन्दोलन तेजी पकड़ने लगा. जागरूक और साहसी विपक्ष ने इंदिरा गांधी को मजबूर कर गुजरात की विधानसभा भंग कराकर नया जनादेश लाने के लिए बाध्य कर दिया। 12 जून, 1975 को हाईकोर्ट के जज ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। इस फैसले से पूरे देश में हड़कंप मच गया। इसी बीच गुजरात विधानसभा के चुनाव में जनता मंच को 182 में से 87 सीटों पर जीत मिली। कुछ स्वतंत्र विधायकों को मिलाकर लगभग 100 सीटे कांग्रेस विरोधियों को मिलीं। बौखलाई इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त जज के यहां अपील कर दी। जज ने सशर्त स्थगन दे दिया। इंदिरा गांधी संसदीय बहस में हिस्सा ले सकती थीं, लेकिन मतदान में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विपक्ष और पार्टी, दोनों ओर से इंदिरा गांधी के सत्ता छोड़ने की मांग तेज होने लगी। 25 जून को 4 बजे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। सभी समाचार माध्यमों, समाचार पत्रों पर सेंसरशिप कानून लागू हो गया। सरकारी खबरों के अलावा कोई खबर जारी नहीं की जा सकती थी। आंतरिक अशांति से निबटने का हवाला देकर आपातकाल लागू कर लोकतंत्र को गिरफ्तार कर लिया गया, मौलिक अधिकार छीन लिए गए । विपक्ष के सभी बड़े नेता गिरफ्तार होने लगे ।
भारतीय राजनीति का यह वो दौर था जब ऊंट दूसरी करवट बैठ रहा था. २३ जनवरी १९७७ को चुनाव की घोषणा हुई. जनता पार्टी ने देशवासियों के बिच प्रचारित किया आम चुनाव के नतीजे ये तय करेंगे की लोकतंत्र या तानाशाही में कौन जीतेगा. नतीजतन, आपातकाल हटने के बाद लोक सभा के हुए चुनाव में  इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी ५४२ में से २९५ सीट जीतकर स्पष्ट बहुमत लाने में सफल हुई और आज़ाद भारत में ३० सालों बाद पहली बार कोई गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बना.

Tuesday, March 29, 2011

क्या उम्र मायने रखती है ?????

28 साल का हूँ जब ये याद आया, जब ज़िन्दगी इक और करवट ले रही थी. कुछ और भी थे जिनसे मिलने लगा था, कुछ थे जो छूट रहे थे. पिछले दशक के हर इक के साथ की यादें और हकीक़त को सोच रहा था. वर्षों पुराना इक भाई याद आ गया फिर कुछ सोच रहा था.... लिख रहा था....
क्या वाकई उम्र मायने रखती है ? हम लोग इक दुसरे से अलग सोचते हैं, इक दुसरे को समझने का नजरिया अलग है. स्कूल के दोस्त कॉलेज समय नही थे, कॉलेज के दोस्त अब नही हैं. आज फिर वादा कर रहे उनसे जिनके साथ हैं कि हम दोस्त हैं हमेशा साथ रहेंगे ठीक उसी तरह जैसे स्कूल, कॉलेज के वक़्त किये थे. ज़िन्दगी के हर अगले पड़ाव में लोग इक दुसरे से अलग क्यूँ होते जाते हैं ?
क्यूँ इक ही दोस्त होता है जो हमेशा आपको समझता है और आप उसे? क्यूँ नही हर रिश्ते हर किसी को समझते हैं और हमेशा साथ रहते हैं?
ठीक अभी अभी इक ऐसे दोस्त से मेरी बात हो रही थी जो दशक के शुरुवात में मिला था. मैं उससे ये सवाल नही कर पाया क्युंकि वो इसे समझ नही पाता. वो पत्रकार नही है न तो वो फिल्ममेकर है.  वो सुबह 10 बजे तैयार होकर मुंबई की लोकल में चलता है उसके पास इतनी फुर्सत भी नही है कि वो सोच सके. पर शायद अच्छा है वो ये बौद्धिक जुगाली नही कर सकता. कम से कम इन उलझनों से दूर किसी और उलझन में परेशान तो है.
क्या समय से भी बड़ा कोई है? जब मैं कॉलेज में था तो ज़िन्दगी के मायने कुछ और थे, आज 4 साल बाद मायने बदल गए, नजरिया बदल गया, अपने कुछ जानने वालों को देखता हूँ जो आज भी कॉलेज में हैं वो ठीक उसी तरह हैं जैसे मैं अपने कॉलेज दिनों में था. लगता है वो भी 4-5 सालों बाद वैसे हो जायेंगे जैसा मैं आज हूँ. शायद मेरे पिता या मेरे उन दोस्तों के पिता भी अपने कॉलेज दिनों में वैसे ही रहे होंगे. कॉलेज खत्म होने के 4-5 सालों बाद उनका भी नज़रिया बदला होगा. आज जब वो रिटायर्ड हो गए हैं काफी बदलाव महसूस कर रहे होंगे. शायद मैं नही समझ सकता क्युंकि मैं ना तो समझना चाहता हूँ ना हि समझ सकता हूँ. अब जब शादी होने जा रही है तो इक और बदलाव देख रहा हूं खुद में. और सोच रहा हूँ शायद हमारे बच्चे जब स्कूल में होंगे तब वैसे ही होंगे जैसे हम या हमारे माता - पिता अपने स्कूल दिनों में थे.
हम  हमेशा अपने से छोटे उम्र वालों को समझाते हैं ज़िन्दगी ये नही कुछ और है, पर जब कोई हमसे बड़ा हमें समझाता है तो लगता है कि चीजें वैसी नही है. अगर उम्र मायने नही रखती तो शायद जब हमें बड़े होते हैं तो हमारा नजरिया नही बदलता. सोचिये, क्या ऐसा होता है?????

Friday, September 24, 2010

आतंकवाद: आतंक और आस्था की राजनीति

आतंकवाद हमेशा से विरोधात्मक एवं हिंसात्मक प्रतिक्रिया रहा है। हिंदुस्तान पाकिस्तान अलगाव के कारण एवं इस बात के लिए होती अन्र्तराष्ट्रीय राजनीति के कारण मुसलमान को आतंक से सबसे पहले जोड़ा गया. अशिक्षा और गरीबी ने पश्चिमी देशो को मौका दिया जिससे अमन और शांति का धर्म जेहाद के मायनों में भटक गया। ऐसा नहीं था कि मुसलमान को आतंक से जोड़ने वाले सिर्फ पश्चिमी देश थे, मुसलमान को आतंकी मुस्लिम नेताओं ने बनाया। जेहाद और कौम के नाम पर मुसलमानों ने खुद मुसलमान को आतंक से जोड़ा। विरोध इस हद तक था कि जेहादियों ने पूरे विश्व में अपना पैर पसार लिया कंहीं इसके प्रभाव में यहूदी आये कंहीं हिन्दू, कंहीं सिख तो कंहीं कोई और समय के साथ मुसलमानों को भी विरोध का सामना करना पड़ा। विश्व के कई देशों ने मुसलमानों को मानव समाज से अलग थलग कर दिया साथ ही जन्म दिया कौमी लड़ाई कोऔर यंही से जन्म हुआ जातिगत आतंक का। क्योंकि जातियां पहले से राजनीति के गिरफ्त में थी इसलिए आतंक के साए में राजनीति ने जातिगत आस्था का सहारा लिया. इसलिए इसे मुस्लिम या भगवा आतंकवाद के रूप में परिभाषित करने के बजाए राजनीतिक आतंकवाद के रूप में परिभाषित करना ज्यादा सार्थक होगा।
भारतीय परिप्रेक्ष में आतंकवाद हमेशा कश्मीर का मुद्दा रहा है, जिसका असर पूरे हिन्दुस्तान में रहा है, पर मुद्दे के बजायें पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और पूर्वोतर राज्यों ने भी कश्मीर के आतंकवाद का कहर झेला है। अपनी बात कहने के लिए आतंक का सहारा लेने वालों ने लाखों भारतीयों को मौत के घाट सुला दिया है। आतंकवाद को हिन्दुस्तान में जिस तरीके से प्रसारित किया गया उससे सबसे ज्यादा नुकसान किसी का हुआ तो वो भारतीय मुसलमान  थे और जिन्होंने इसका फायदा उठाया और वो राजनेता रहे हैं।
फूट डालो और शासन करों की तर्ज पर राजनेताओं ने हिन्दु, मुसलमान, सिख और इसाई सबको कभी भारतीय नहीं बनने दिया। अपने फायदे के लिए साधारण भारतीयों को मानव बम बनाकर गली-मौहल्लों में आतंक फैलाने वाले सियासी नेता कल तक मुस्लिम आतंकवाद का नाम दे रहे थे, आज उसे हिन्दु आतंकवाद नहीं बल्कि भगवा शब्द का प्रयोग कर करोडो़ हिन्दुओं की आस्था को आतंकवाद से जोड दिया। 
राम ने पाप का अंत कर पुण्य को जीत दिलायी थी, रामभक्त उनकी जमीन और उनके नाम की शह पर इंसानीयत का अंत कर आतंकवाद को पैदा कर रहे हैं। कल तक आतंकवाद को मुसलमान से जोड़ने वालो में हिन्दू सबसे आगे थे आज भगवा शब्द का आतंक से नाम जुड़ा तो देश भर के हिन्दुओं ने विरोध किया। ऐसा नहीं है कि सारे मुसलमान आतंकी हैं या फिर सारे हिन्दू या सिख पर सबसे बडा़ सवाल यह है कि क्यों नहीं ये हिन्दु आतंकवादी हैं जिन्हें कल तक आतंकवाद में मुसलमान दिखता था। पंजाब में आतंकवाद था मुसलमान नहीं थे। कर्नाटक में आतंकवाद था मुसलमान नहीं थे। अयोध्या में आंतक हुआ बल्कि अभी भी हो रहा है यहां भी मुसलमान नहीं हैं। खुद को पाक साफ कहने वाले हिन्दुओं ने क्या मुसलमानों को आतंकवादी बनने के लिए शह नहीं दी?
हाल ही में एक मशहूर पत्रिका के स्टींग ऑपरेशन ने खुलासा किया कि श्री राम सेना जो राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हैं पैसे लेकर आंतक फैलाते हैं। श्रीराम सेना के एक बडे़ अधिकारी के अनुसार वो रामभक्त हैं और राम की जमीन को पवित्र करने की कोशिश कर रहे हैं। कभी गंदी राजनीति के सहारे कभी हथियारों के सहारे। गृह मंत्री पी. चिदम्बरम के भगवा (शेफरन) शब्द के प्रयोग के बाद भारतीय हिन्दुओं के बीच खलबली मच गयी पर शायद हिन्दु भूल गये कि अयोध्या की जमीन पर आतंक फैलाते वक्त इनके जुबान पर ‘जय श्री राम’ और शरीर पर ‘भगवा रंग’ था। कई बुद्धिजीवी और अप्रत्यक्ष राजनीति में सक्रिय कई पत्रकार भगवा को सन्यास और भक्ति से जोड़कर बेवजह मामले पर अपनी बुद्धिजीविता को दिखने में लग गए पर किसी हिन्दू में इतनी ताकत नहीं दिखी जो भगवा शब्द के बजाय हिन्दू शब्द को आतंक से जोड़कर ये माने की आतंक की न कोई जात रही है न है।
 अयोध्या की संकरी गलियों से लेकर कश्मीर की वादियों तक में आतंकवादियों के आतंक का शिकार आम आदमी हुआ है जिसका आतंक से कोई लेना देना नहीं है। आतंक से जीना बेहाल  सिर्फ उनका हुआ है जो अपने ही देश में डरे सहमे जीने की कोशिश कर रहें हैं।
जम्मू - कश्मीर, बिहार, झारखण्ड, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराश्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, नागालैंड, असम, त्रिपुरा, मणीपुर, मिजोरम, कर्नाटक, तमिलनाडु समेत पूरे हिन्दुस्तान में तकरीबन 178 ऐसी जगह हैं जहां कश्मीर जैसी या उससे भी भयवाह स्थिति है। कहीं आतंकवाद है कहीं उग्रवाद हैं। कहीं कोई मुस्लीम आतंक फैला रहा है तो कहीं हिन्दू, कंही सिख तो कहीं इसाई। ये मुस्लिम आतंक है या हिन्दू आतंक है । या सिर्फ आतंक।
जातिगत समाज में उपलब्ध मतदाताओं की जानकारी हर राजनेता के पास होती है पर आतंक फैलाने वालों की जानकारी किसी के पास नहीं है। कश्मीर में पत्थर कौन चलाते हैं इसे कोई राजनेता नहीं कह सकता पर टी.वी. चैनलों पर आकर बोलने का मौका दीजिए फिर देखिये इनके शब्दों का प्रयोग और अपनी-अपनी कौम के नाम पर लोगों को वर्गलाने में कोई कसर नहीं छोडते।
ऐसा लगता है कि गाँधी चले गये गये और आज के इन राजनेताओं को छोड़ गए। वर्षों से ये राजनेता राजनीति करते आ रहे हैं, कराते आ रहे हैं पर कोई हल नहीं निकला है और न ही निकलेगा क्योंकि जिस दिन आतंक और जाति की राजनीति खत्म होगी हल तो निकल जायेगा पर इनको शह देने वालों की राजनीति खत्म हो जाएगी।
दक्षीण एशिया में साम्यवाद के नाम पर 32 से भी ज्यादा संगठन हैं जो कौमी तौर पर हिंसक रवैया अपनाते हैं और इन्होंने अपनी-अपनी छतरी को भगवान या अल्ला के नाम से रंग रखा है।
आतंकवाद  एक संगठीत व्यवसाय है जिसे विभिन्न देशों में मौजूद राजनेता  अपने- अपने फायदे के लिए प्रयोग कर रहें हैं।
इस प्रयोग में इनका कोई नुकसान नहीं है और इन प्रयोग से मरने वालों का कोई हिसाब नहीं हैं। आस्था के नाम पर खून की नदियाँ बहाने वाले हमेशा यह तर्क देते आये हैं कि हम भी चुप नहीं बैठेंगे, अगर हमारी आस्था पर चोट पहुँचती है तो विरोधात्मक और हिंसात्मक रवैया अपनाकर हम भी आतंक का सहारा लेंगे लेकिन ये हिन्दु आतंकवादी है भगवा आतंकवादी नहीं अगर कंही कोई मुस्लिम आतंकवादी है तो। ये भी उतने ही क्रूर सजा के लायक हैं जितना की अफजल गुरू।

  • गृह मंत्री पी. चिदम्बरम के भगवा (शेफरन) शब्द  के प्रयोग के बाद भारतीय हिन्दुओं के बीच खलबली मच गयी पर शायद 
हिन्दु भूल गये कि अयोध्या की जमीन पर आतंक फैलाते वक्त इनके जुबान पर ‘जय श्री राम’ और शरीर पर ‘भगवा रंग’ था। 

  • मुसलमान को आतंक से जोड़ने वाले सिर्फ पश्चिमी देश नहीं थे, मुसलमान को आतंकी मुस्लिम नेताओं ने बनाया। जेहाद और कौम के नाम पर मुसलमानों ने ही खुद को आतंक से जोड़ा। अशिक्षा और गरीबी ने पश्चिमी देशो को मौका दिया जिससे अमन और शांति का धर्म जेहाद के मायनों में भटक गया।

  • एक मशहूर पत्रिका के स्टींग ऑपरेशन ने खुलासा किया कि ‘श्री राम सेना’ जो राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हैं पैसे लेकर आंतक फैलाते हैं।  श्रीराम सेना के एक बडे़ अधिकारी के अनुसार वो रामभक्त हैं और राम की जमीन को पवित्र करने की कोशिश कर रहे हैं। कभी गंदी राजनीति के सहारे कभी हथियारों के सहारे।